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बेगाने शहर में ये शख्स बना था बिग बी का दोस्त, 45 साल पुरानी है दोस्ती


आज से 45 साल पहले जब अमिताभ बच्चन अभिनेता बनने की ख्वाहिश लिए मुंबई आए थे तो इस शहर में अनवर अली उनके दोस्त बने थे।

अमिताभ बच्चन 75 साल (11 अक्टूबर) के होने जा रहे हैं। आज से 45 साल पहले जब अमिताभ बच्चन अभिनेता बनने की ख्वाहिश लिए मुंबई आए थे तो बेगाने शहर में जिस एक अदद दोस्त की तलाश हर शख्स को होती है, वह उनके लिए अनवर अली बने थे।

अनवर का एक परिचय यह है कि वे तब के टॉप स्टार-एक्टर महमूद के सबसे छोटे भाई है, जिन्होंने तब भी इंडस्ट्री के एक स्थापित परिवार के खास सदस्य का रुतबा हासिल था।

अनवर के इस रुतबे के साथ तब अमिताभ की दोस्ती का जो रंग चढ़ा, वह बदलते मौसमों में अब भी अपनी पहली-सी रंगत लिए हुए है। इसकी तसदीक स्वयं अनवर ने अपनी लेखिका पत्नी मोना माथुर अली के जरिए की है।

वजह यह है कि गले के एक इंफेक्शन की वजह से वे इन दिनों ज्यादा बोल पाने की हिकमत में नहीं हैं। प्रस्तुत है अनवर की जुबानी अमिताभ बच्चन से दोस्ती की यह कहानी...

आप दोनों की दोस्ती में कभी कुछ इम्तेहान आए हैं?

अगर हम दोनों के मन में किसी भी स्थिति में किसी प्रकार का दुराव होता तो हमारी दोस्ती का इम्तेहान पास करने योग्य नहीं होता।

 हमारी 45 साल की दोस्ती में हमेशा दोस्ती ही रही, इसीलिए हम आज भी साथ हैं। बेशक, यह हमारे इर्द-गिर्द के लोगों के लिए इम्तेहान हो सकता है, क्योंकि वे दोस्ती की एक समझ रखते हैं।

इर्द-गिर्द के उन लोगों ने आप दोनों के बीच समाजी संबंधों को किस तरह जांचा-परखा? मसलन, आपकी तकलीफ के वक्त साथ खड़ा होना या आपका अभिषेक बच्चन की शादी में शामिल होना वगैरह-वगैरह?

यह बात हमारी अंडरस्टैंडिंग में इतनी गहरी है कि हमने इस तरह के मेल-मिलाप को ही कभी ज्यादा तरजीह नहीं दी, लेकिन जब जरूरत होती है तो एक-दूसरे के लिए खड़े होते हैं।

जहां तक अभिषेक बच्चन की शादी की बात है तो अमित जी ने उस अवसर पर जिन डेढ़ सौ लोगों को आमंत्रित किया था, उनमें तीन लोग हम थे। लेकिन जहां जरूरत नहीं होती है तो उस फोटो या फ्रेम में हम दोनों साथ न भी दिखें।

वे सांसारिक बातें हम दोनों के लिए ही मायने नहीं रखती हैं। जब हम में से कोई तकलीफ में होता है तो एक-दूसरे के लिए एकांत में प्रार्थना करते हैं, यह यकीनी है।

आप और अमित जी में से कौन उम्र में बड़ा है और वे आपको जन्मदिन की मुबारक किस तरह देते हैं?
मेरा जन्मदिन 10 मार्च है।

उस दिन अमित जी मुझे एक पहेलीनुमा लिखित संदेश जरूर भेजते हैं। उस संदेश की बातें केवल हम दोस्त ही समझते हैं। (हंसते हैं) उसे मैं आपको भी नहीं बता सकता।

 इसी तरह मैं भी उन्हें संदेश भेजता हूं और पिछले 45 वर्षों से हमारा यह तरीका अब तक मजेदार ही रहता है। बेशक, वह संदेश उम्र और तमाम समाजी बदलाव के साथ अपने आकार-प्रकार में छोटे-बड़े होते रहते हैं।

आपकी पत्नी यानी मोना जी भी उस कूट-संदेश को बुझा नहीं पाई हैं?

जी नहीं, (हंसते) । मुझे लगता है कि अगर उन संदेशों के मायने सुलझाए जाने लगे तो वह हमारी दोस्ती की अंतरंगता को भंग करने जैसा होगा।

आपकी पत्नी मोना जी ने आप दोनों की दोस्ती पर जो बुक 'अमिताभ एंड आय मेमॉएर्स: अनवर अली' लिखी है। उसके पीछे आपका नजरिया क्या है?

सबसे पहली बात तो यही थी कि बुक सिंपल लैंगुएज में हो जो सबको आसानी से समझ में आए। एक दोस्ती में जो बेशर्त प्यार होता है, वह सिंपली निखर कर आए।

 ताकि पाठकों को अहसास हो कि बेशर्त प्यार और दोस्ती के पैमाने क्या होते हैं। देखा जाए तो हमारी दोस्ती कृष्ण-सुदामा जैसी है, जिसमें मैं बहुत मामूली-सा अंतर देखता हूं। हमारी स्टोरी में कृष्ण और सुदामा अपने रोल बदलते रहते हैं।

अगर आप हमारी दोस्ती का ग्राफ निकाल कर देखें तो पाएंगे कि माना मैं शुरू में कृष्ण था तो अब अमित जी कृष्ण हैं। इसी तरह बीच के समय में भी हमारे रोल बदले हैं।

हां, एक और बात कि कृष्ण-सुदामा की दोस्ती में हम सभी लोग एक गहरी बात भूल जाते हैं कि कृष्ण तमाम बातों से मालामाल कितने सिंपल थे और सुदामा निर्धन होते हुए कितना धनी था।

 तो सिंपलीसिटी समझने से आती है और रिचनेस दान देने से। किताब पढ़कर ऐसी ही बातें हमें कई लोगों ने बताई हैं, इसलिए मैं इस बुक का कामयाब समझता हूं।

इस दोस्ती में आपकी पत्नी का कैसा योगदान रहा?

देखा जाए तो यह प्रश्न 'नोट एप्लिकेबल' की श्रेणी में आता है। (हंसते हैं) क्योंकि हमारी दोस्ती में न किसी की मदद की और न किसी के दखल की जरूरत है। यह सब अन्य बातों से परे है।

जैसे अमित जी अपने आप में कई यूनिक गुण रखते हैं तो उस लिहाज से हमारी दोस्ती भी उनका और मेरा एक विशेष गुण है।

आपने बतौर निर्माता अमित जी के साथ फिल्म 'खुद्दार' बनाई थी। वह फिल्म 30 जुलाई 1982 को रिलीज हुई थी। इस तरह अमित जी के 75 वर्ष पूरे होने के साथ वह फिल्म 35 साल कंपलीट कर गई है। क्या उन दिनों के कुछ मजेदार वाक़या बताना चाहेंगे, जब आप यह फिल्म बना रहे थे?

सबसे पहली बात यही कहूंगा कि अमित जी पिछले चंद सालों से नहीं, बल्कि डे-वन से बड़े पंक्चुअल रहे हैं। हम लोग चांदिवली स्टूडियो में सेट लगाकर इस फिल्म की शूटिंग कर रहे थे।

 एक रोज हम लोग 15 मिनट देरी से सेट पर पहुंचे थे, लेकिन अमित जी अपना काम शुरू कर चुके थे। हमने देखा कि वे स्टूडियो में लगे छोटे-छोटे पौधों को पानी दे रहे थे। उन्हें देखकर हम सबको बड़ी शर्मिंदगी हुई थी।

दूसरी बात यह है कि 'खुद्दार' के लिए हमने हाउसिंग-सोसायटी के तहत जो घर बनाए थे, वे काफी पक्के थे, जिनमें सालों तक लोग वहां रहे और शायद अब भी हों। एक और अहम वाक़या यह है कि जब 'खुद्दार' रिलीज हुई थी तो उसी दौरान अमित जी को 'कुली' की शूटिंग के दौरान गंभीर चोट लगी थी।

 मैं जब उन्हें ब्रीच-कैंडी हॉस्पिटल देखने पहुंचा तो उल्टे उन्होंने ही मुझसे पहली बात पूछी कि मूवी कैसी चल रही है? मैंने कहा, सुपर हिट है और आप उसकी फिक्र मत करो।

बाद में हरिवंश राय जी ने माना था कि उनके जीवन की चार बेहतरीन फिल्मों में से एक 'खुद्दार' है।

'खुद्दार' की शूटिंग के दौरान आप, अमित जी और फिल्म की हीरोइन परवीन बॉबी ने कुछ खास मौके एक साथ शेयर किए हों, उनके बारे में बताइए?

हम लोग एक टीम की तरह साथ में काम करते थे। हां, फिल्म का एक जन्माष्टमी सांग 'मच गया शोर सारी नगरी रे...', तो ऑल-टाइम क्लासिक बन गया है।

 उसमें परवीन बॉबी जी ने महाराष्ट्रीयन साड़ी पहनी थी और अमित जी एकदम अपने ट्रू-एलिमेंट में थे। वह गाना आज हर जन्माष्टमी पर बार-बार बजाया जाता है। तो वह गाना हम तीनों की एक खास यादगार है।

आप दोनों की पिछली मुलाकात कब हुई थी?

हम फिजिकल मीटिंग का ट्रेक नहीं रखते हैं। हां, भले हम पार्टीज या खाने-पीने के अवसरों पर साथ में उतने न दिखते हों, लेकिन हम धार्मिक स्थलों पर एक-साथ काफी जाया करते हैं।

 काफी सालों से हमारा यह रुटीन रहा है कि मुंबई के पांच-छह मंदिर-मस्जिद में हम दोनों बहुत तड़के सुबह साथ जाया करते थे। इन्हीं मुलाकातों को हम रीयल-मीटिंग मानते हैं, जब हम आत्मा धारण कर ऊपर वाले के सामने होते हैं।

अब आप अपने प्रोडक्शन के तहत कुछ नया करने की योजनाएं बना रहे हैं? और अपने बेटे अकार के बारे में क्या सोच रहे हैं?

कुछ स्क्रिप्ट्स पर काम कर रहा हूं। आने वाले कुछ महीनों में मैं कुछ न कुछ एनाउंस करने वाला हूं। बेटा अकार चार साल की उम्र से एशियन रैंकिंग के साथ स्पोर्टस-पर्सन है।

वह ऐसे माहौल में पला-बढ़ा है, जिसमें स्पोर्टस और फिल्म दोनों बड़े स्ट्रांग रहे हैं। वह डैनी जी के बेटे रिनझिंग पेमा, जैकी श्रॉफजी के बच्चे टाइगर, कृष्णा और अन्य जीवा, नकुल ये सब बच्चे साथ में बड़े हुए हैं।

 इनमें डैनी भाई और उनकी पत्नी गावा जी ने तो इन सब बच्चों की एक गार्जियन की तरह जिम्मेदारी संभाली हुई है। और अब सबको अपनी डेस्टिनी ऑटोमेटिकली मिलती जा रही है, सो मुझे पूरा यकीन है कि अकार भी अपनी राह जल्द पकड़ लेंगे।

आप दोनों की दोस्ती को लेकर हरिवंश राय बच्चन एवं तेजी बच्चन जी क्या कहा करती थीं?
दोस्ती के बारे में उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से ऐसी बातें बताई, जो मेरी जिंदगी की मशाल-ए-राह हो गईं।

उन्होंने मुझे 'शून्य' का महत्व इतने विस्तार और गहराई के साथ समझाया कि वह ज्ञान प्रकाश मेरे जीवन और अन्य संबंधों को समझने में मुझे पूरी तरह क्लीयर करने वाला रहा।

 तो उन्होंने हमारी दोस्ती को लेकर सीधी बातें न कर इस तरह से उसका महत्व समझाया था। इसी तरह अमित जी के मुंबई के शुरुआती दिनों में जब एक बार मैं और वे उनके दिल्ली वाले घर पर गए थे

तो मां जी (तेजी बच्चन) ने मुझसे कहा कि यह मैं तुम पर डिपेंड कर रही हूं कि तुम मेरे बेटे का खयाल रखोगे। इसे मैं डेस्टिनी मानता हूं कि हमारा साथ हुआ और हम दोनों ने जिंदगी के कई महत्वपूर्ण पड़ाव साथ में गुजारे।

महमूद जी आपके बड़े भाई आप दोनों की दोस्ती को लेकर क्या कहते थे?

भाईजान हमारी क्लोजनेस के बारे में जानते थे कि अली हाउस होल्ड में हम दोनों एक ही रुम में रहते हैं और हमारी इच्छाएं और लक्ष्य एक-से हैं। दोनों एक-साथ काम की तलाश में घर से बाहर निकलते थे।

दोनों को गाने का शौक था तो घर के बर्तन बजाकर गाने गाया करते थे। तब हमारा फेवरेट गाना हरिवंश जी की लिखी कविता 'सोन मछरी...' हुआ करती थी। कभी शाम के समय हम दोनों पार्टियां भी किया करते थे।

 दो-तीन सालों तक हमारी सुबह से शाम तक का रुटीन देखकर भाईजान भी उन्हें परिवार का हिस्सा मानने लगे थे। 'बोंबे टु गोवा' इसका एक बड़ा उदाहरण है।