साईंबाबा: जिनकी जिंदगी सिर्फ लोगों की भलाई में बीती, लोगों को धार्मिक एकता का पाठ पढ़ाते रहे
साईंबाबा जिन्हें शिरडी साईंबाबा के नाम से जाना जाता है। एक भारतीय गुरु, योगी और फकीर थे, जिन्हें उनके भक्तों द्वारा संत कहा जाता है।
उनके सही नाम, जन्म, पता और माता पिता के बारे में कोई सही जानकारी नहीं है। जब उनसे उनके पूर्व जीवन के बारे में पुछा जाता था, तो वह टाल-मटोल कर उत्तर दिया करते थे।
साईं शब्द उन्हें महाराष्ट्र के शिरडी नामक कस्बे में पहुंचने के बाद मिला। हालांकि साईं का जीवनकाल 1838-1918 तक माना जाता है। कई लेखकों ने साईं पर पुस्तकें लिखीं हैं। साईं पर लगभग 40 किताबें लिखी गई हैं।
भक्त और इतिहासकार इस बात से सहमत हैं कि जन्म स्थान और डेट के बारे में कोई भी विश्वनीय स्रोत नहीं है।
इतना ही पता है कि उन्होंने काफ़ी समय मुस्लिम फकीरों संग बिताया, लेकिन माना जाता है कि उन्होंने किसी के साथ धर्म के आधार पर कोई व्यवहार नहीं किया।
उनके एक शिष्य दास गनु द्वारा पथरी गांव पर तत्कालीन काल पर शोध किया जिसके चार पेजों में साईं के बचपन के बारे में लिखा गया है जिसे श्री साईं गुरुचरित्र भी कहा जाता है।
दास गनु के अनुसार उनका बाल्यकाल पथरी ग्राम में एक फकीर और उनकी पत्नी के साथ गुजरा। लगभग 16 साल की उम्र में वो अहमदनगर, महाराष्ट्र के शिरडी गांव में पहुंचे और जीवन के अंत तक वहीं रहे ।
साईं 15 अक्टूबर 1918 को इस नश्वर संसार को छोड़ गए।
बता दें कि शिरडी के साईं की प्रसिद्धि दूर-दूर तक है। उनके नाम पर बना पवित्र धार्मिक स्थल महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित है। यह साईं की धरती है, जहां साईं ने अपने चमत्कारों से लोगों को अचंभित किया।
साईं का जीवन शिरडी में बीता जहां उन्होंने लोक कल्याणकारी कार्य किए। उन्होंने अपने फॉलोवर्स को भक्ति और धर्म की शिक्षा दी।
साईं के फॉलोवर्स में देश के बड़े-बड़े नेता, खिलाड़ी, फिल्म कलाकार, बिजनेसमैन, शिक्षाविद समेत करोड़ों लोग शामिल हैं।
शिरडी में साईं का एक विशाल मंदिर है। जिसकी मान्यता है कि, चाहे गरीब हो या अमीर साईं के दर्शन करने इनके दरबार पहुंचा, कोई भी शख्स खाली हाथ नहीं लौटता है।
सभी की मुरादें और मन्नतें पूरी होती हैं। शिरडी में साईं कहां से प्रकट हुए यह कोई नहीं जानता। साईं असाधारण थे और उनकी कृपा वहां के सीधे-सादे गांववालों पर सबसे पहले बरसी।
आज शिरडी एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है।
साईं के उपदेशों से लगता है कि इस संत का धरती पर प्रकट होना लोगों में धर्म, जाति का भेद मिटाने और शान्ति, समानता की समृद्धि के लिए हुआ था।
साईं बाबा को बच्चों से बहुत प्यार था। साईं ने हमेशा कोशिश की, कि लोग जीवन की छोटी-छोटी समस्याओं और मुसीबतों में एक दूसरे की सहायता करें।
एक दूसरे के मन में प्यार और एक-दूसरे की इज्जत करें। इस उद्देश्य के लिए उन्हें अपनी दिव्य शक्ति का भी प्रयोग करना पड़ा।
शिरडी का साईं मंदिर
शिरडी में साईं बाबा का पवित्र मंदिर साईं की समाधि के ऊपर बनाया गया है। साईं के कामों को आगे बढ़ाने के लिए इस मंदिर का निर्माण 1922 में किया गया था।
साईं 16 साल की उम्र में शिरडी आए और चिरसमाधि में लीन होने तक यहीं रहे। साईं को लोग आध्यात्मिक गुरु और फकीर के रूप में भी जानते हैं।
साईं अपने जीवनकाल के दौरान मस्जिद में रहे थे, जबकि उनकी समाधि को मंदिर का रूप दिया गया है।
साईं का रिकॉर्ड चढ़ावा
साईं की समाधि पर डेली लाखों की तादाद में लोग आते हैं। शिरडी के साईं बाबा का मंदिर अपने रिकॉर्ड तोड़ चढ़ावे के लिए हमेशा ख़बरों में भी रहता है। साल दर साल यह रिकॉर्ड टूटता ही जा रहा है।
कुछ दिनों पहले किए गए आकलन के अनुसार साल 2011 में भक्तों ने यहां अरबों रुपये चढ़ाए हैं। किसी ने साईं को सोने का मुकुट दिया तो किसी ने सोने का सिंहासन।
किसी ने चांदी की बेशकीमती आभूषण दिए तो किसी ने करोड़ों की संपत्ति। कोई करोड़ों का गुप्तदान करके चला गया तो किसी ने अपनी पूरी जायदाद भगवान के हवाले कर दी।
साईं की शिक्षा
जाति, धर्म, समुदाय, इत्यादि व्यर्थ बातों में ना पड़कर आपसी मतभेद को दूर कर आपस में प्रेम और सद्भावना से रहना चाहिए क्योंकि सबका मलिक एक है, यह साईं बाबा की सबसे बड़ी शिक्षा और संदेश है।
साईं बाबा ने यह संदेश भी दिया कि हमेशा श्रद्धा, विश्वास और के साथ जीवन जिएं । लोगों में मानवता के प्रति सम्मान का भाव पैदा करने के लिए साईं ने संदेश दिया है कि किसी भी धर्म की अवहेलना नहीं करें।
उन्होंने कहा है कि सर्वधर्म सम्मान करते हुए मानवता की सेवा करनी चाहिए क्योंकि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।


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