जिस अंग्रेज पर थी इस शहीद को ढूंढने की जिम्मेदारी, उसी के बने ड्राइवर
अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद ने अपनी जिंदगी के 10 साल फरार रह कर बिताए। जिसमें से करीब 5 साल उन्होंने बुंदेलखंड के अलग-अलग स्थानों पर बिताए थे। उनके बर्थडे (23 जुलाई) के मौके पर हम एक ऐसे ही स्थान के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां उन्होंने करीब डेढ़ साल का अज्ञातवास काटा। अंग्रेजों की गाड़ी चलाकर खुद की तलाश करवाते रहे
1924 में झांसी जिले के मुख्यालय से करीब 14 किलोमीटर दूर सातार नदी के किनारे जंगल में आजाद ने अपने अज्ञातवास के डेढ़ साल बिताए। इस दौरान उन्होंने यहां एक हनुमान मंदिर की स्थापना भी की थी।
- इस मंदिर में मौजूदा पुजारी प्रभुदयाल ने बताया, यहां आने के बाद आजाद ने उस अंग्रेज अफसर के यहां ड्राइविंग की, जिसको उन्हीं तलाशी के लिए लगाया गया था। वो 8 महीने तक उसके यहां गाड़ी चलाते रहे और खुद की तलाश करवाते रहे।
अपने हाथ से खोदी गुफा-कुआं
- यहां उनका नाम हरिशंकर रखा गया था। जिससे उनकी पहचान न हो सके। जब उस अफसर को उन पर कुछ शक हुआ, तब तक आजाद वहां से भाग निकले और पुजारी का वेश धारण कर लिया।
- उसके बाद उन्होंने मंदिर में एक कुआं खोदा, जो आज भी मौजूद है और जंगल में जाने के लिए हनुमान मंदिर से सिद्धबाबा मंदिर तक एक गुफा का निर्माण किया।
- उन्होंने अंग्रेजों से बचने के लिए अपने हाथ से एक गुफा खोदी, जिसका वो जंगल में भागने के लिए इस्तेमाल करते थे और एक कुंआ खोदा जिसका वह पानी पीते थे। ये दोनों ही आज भी मौजूद हैं।
- अंग्रेज मंदिर के आसपास आते थे, तो वो इसी गुफा से होकर निकल जाते थे। फिलहाल इसमें दरारें पड़ चुकी है।
जंगल में करते थे शूटिंग प्रैक्टिस
- सातार के पास ढिमरपुरा गांव के रहने वाले मलखान सिंह से उनकी अच्छी दोस्ती थी। उन्हीं के साथ जंगल में शिकार करने जाते थे। जहां राइफल से जमकर निशानेबाजी की प्रैक्टिस करते थे।
- यहां मौजूद कुटिया में जमीन पर सोकर उन्होंने आजादी के लिए डेढ़ साल तक तपस्या की थी। मिट्टी का चबूतरा ही उनकी चारपाई थी जो आज भी उनकी निशानी बना हुआ है।
वेश बदलने में माहिर आजाद इसी कुटिया में क्रांतिकारियों के साथ करते थे बैठक
- बीकेडी डिग्री कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. बाबूलाल तिवारी बताते हैं, वेश-भूषा बदलकर अंग्रेजों के सामने से निकल जाना चंद्रशेखर के बाएं हाथ का खेल था।
- ये सच है कि अंग्रेज कभी चंद्रशेखर आजाद को देख नहीं पाए थे। इसलिए आजाद की तस्वीर के लिए अंग्रेज कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थे।
- उन्होंने झांसी और इसके आसपास करीब 5 साल से ज्यादा का समय बिताया है। सातार के पास बनी उनकी कुटिया में उनके सहयोगी क्रांतिकारी उनके साथ बैठक करने आते थे।
- यहीं से अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध की रणनीति तैयार की जाती थी। आज भी इस जगह दो चबूतरे बने हैं, जहां आजाद और उनके साथी बैठा करते थे।


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