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बैंक ग्राहक ध्यान दें इन मुफ्त सुविधाओं का भी 20 जनवरी से देना पड़ सकता है चार्ज



20 जनवरी से बैंकिंग सर्विसेज अभी से और ज्यादा महंगी हो सकती हैं। अभी तक जिन सुविधाओं का कोई शुल्क नहीं लगता, उन पर भी बैंक ग्राहकों को शुल्क देना पड़ सकता है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक शुल्क बढ़ाने के इंटरनल इंस्ट्रक्शंस बैंकों को मिल चुके हैं। अभी सभी बैंकों के बोर्ड इन इंस्ट्रक्शंस के मुताबिक अलग-अलग सेवाओं पर चार्जेस तय करेंगे।


यह चार्जेस लागू होते हैं तो आपके अकाउंट से सीधे शुल्क कटेगा। देशभर के अकाउंट होल्डर्स इससे प्रभावित होंगे। बैंक ग्राहक पहले ही कई तरह के चार्जेस दे रहे हैं। इसमें मिनिमम बैंलेंस न होने से लेकर एटीएम से निकाले जाने वाली राशी को लेकर लगने वाले चार्जेस तक शामिल हैं।ऐसे में यह नये चार्जेस ग्राहकों को और बड़ा झटका दे सकते हैं।


बैंक छोटी-छोटी सर्विसेज के चार्ज लेता है तो इससे ऑनलाइन सर्विसेज को बढ़ावा मिलेगा। फिर लोग हर काम के लिए बैंक जाने के बजाए ऑनलाइन ही इसे करना प्रिफर करेंगे। कई बैंकर्स ने इस कदम को सही ठहराया है। उनका कहना है कि होम ब्रांच के बजाए यदि कोई दूसरी ब्रांच से लेनदेन करता है तो उस पर चार्जेस लगना ही चाहिए।





पैसा निकलाने, जमा करने, मोबाइल नंबर बदलवाने, केवाईसी पता बदलवाने, नेट बैंकिंग और चेक बुक के लिए आवेदन करने जैसी सुविधाएं पर शुल्क लग सकता

है।




 बैंक की जिस ब्रांच में आपका अकाउंट है, आप वहां के बजाय किसी दूसरी ब्रांच से सर्विसेज लेते हैं तो आपको इसके लिए चार्ज देना पड़ सकता है। इस पर

जीएसटी भी आपको देना होगा। यह पूरा शुल्क आपके अकाउंट से संबंधित बैंक काट लेगा।


आपके बैंक अकाउंट से यदि कोई फ्रॉड हुआ है, जिसमें आपकी गलती नहीं है तो बैंक को पूरा पैसा आपको रिफंड करना होगा। ऐसे केस में कस्टमर को 3 दिनों के अंदर बैंक को इंफॉर्म करना होता है।



3 दिन में इंफॉर्म न करने पर कस्टमर की भी कुछ लाइबिलिटी हो जाती है। बेसिक सेविंग अकाउंट होने पर कस्टमर की मैक्सिमम लाइबिलिटी 5 हजार रुपए की होती है। ओवरड्रॉफ्ट अकाउंट और जिस अकाउंट में एवरेज बैलेंस 25 लाख रुपए साल तक है, उसमें कस्टमर की लाइबिलिटी मैक्सिमम 10 हजार रुपए तक होती है। वहीं जिन अकाउंट्स में क्रेडिट कार्ड लिमिट 5 लाख रुपए तक होती है, उनमें मैक्सिमम लाइबिलिटी 25 हजार रुपए तक होती है।


किसी कस्टमर के साथ ऐसी धोखाधड़ी होती है तो कस्टमर के इंफॉर्म करने के 10 दिनों के अंदर बैंक को कस्टमर के अकाउंट में पैसा ट्रांसफर करना होता है। इसके अलावा जिस केस में कस्टमर की लाइबिलिटी होती है, वहां शिकायत का निराकरण 90 दिनों के अंदर होना जरूरी है।