वो लड़की, जिसने 13 साल में एवरेस्ट फतह कर बनाया था वर्ल्ड रिकॉर्ड, रास्ते में पड़े मिले थे शव
जो सोचते हैं कि लड़कियां हर काम नहीं कर सकतीं। उनके लिए मालावथ पूर्णा एक मिसाल है। सिर्फ 13 साल की उम्र में एवरेस्ट की सबसे ऊंची चोटी छूकर पूर्णा ये साबित कर दिया कि लड़कियां कुछ भी कर सकती हैं। तेलंगाना के छोटे से पकाला गांव में रहने वाली पूर्णा देखते ही देखते एक ऐसी शख्सिायत बन गई हैं, जिसके बारे में जानने और जिसकी सफलता की कहानी सुनने को हर आदमी उत्सुक है।
माउंट एवरेस्ट की सबसे ऊंची चोटी को सबसे कम उम्र में छूने वाली दुनिया की दूसरी और भारत की पहली व्यक्तिं हैं और दुनिया की पहली लड़की हैं। दरअसल, पूर्णा ने जब एवरेस्ट की चढ़ाई की तब वो 13 साल 11 महीने की थीं, जबकि जॉर्डन रोमेरो ने 13 साल 10 महीने की उम्र में यह कारनामा किया था।
इसके लिए पूर्णा को कड़ी मेहनत करनी पड़ी थी। उस वक्त पूर्णा तेलंगाना के गवर्नमेंट स्कूल की नौंवी क्लास में पढ़ती थी। उनका स्कूल रेसीडेंशियल था, इसलिए बाहरी दुनिया की बहुत कम चीज़ों से वाकिफ थी। एक दिन रॉक क्लाइम्बिंग स्कूल से एक टीम आई जो माउंटेनियरिंग ट्रेनिंग के लिए स्टूडेंट्स सिलेक्ट कर रही थी। आठ महीने तक फिज़िकल और मेंटल ट्रेनिंग दी गई। दार्जलिंग, सिक्किम और लद्दाख में हमें जॉगिंग, ट्रेकिंग, वेट कैरिंग जैसी एक्सरसाइज़ और मेडिटेशन के ज़रिए माउंटेनियरिंग के लिए तैयार किया गया। 110 में से केवल दो स्टूडेंट्स का सिलेक्शन किया गया। उसमें से पूर्णा एक थी।
पूर्णा ने 25 मई 2014 को क्लाइंबिंग स्टार्ट की। 54 दिन में पूर्णा एवरेस्ट फतह करके वापस आ गई। पूर्णा जब नीचे आई तब उनको पता चला कि उन्होंने वर्ल्ड रिकॉर्ड बना दिया है। वो माउंट एवरेस्ट समित करने वाली सबसे कम उम्र की पर्वतारोही हैं।
पूर्णा को इस दौरान काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। कई बार वो विचलित भी हुई लेकिन हिम्मत नहीं हारी। ऊंचाई, बफिर्ली हवाएं, सब ज़ीरो टेम्परेचर और मेंटल स्टेट, ऐसी कई चुनौतियां आपको ऊपर चढ़ने से रोकती हैं। क्लाइम्बिंग के दौरान कई माउंटेनियर्स की डेड बॉडीज भी रास्तों में मिलती हैं जो सालों से वहीं पड़ी हैं।
लेकिन पूर्णा ने अपना ध्यान समिट करने में लगा रखा था। आखिरकार पूर्णा ने वो कर दिखाया, जो पर्वातारोहियों का सपना होता है।


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