यहां के दशहरे को देखने आते थे अंग्रेज, सोने-चांदी से होता था हाथियों का श्रृंगार
83 साल पहले ग्वालियर में रॉयल दशहरा जुलूस निकलता था। इस दिन ग्वालियर के महाराज पैलेस से 18 घोड़ों वाली बग्घी में बैठकर निकलते थे। मैसूर के बाद देश के दूसरे सबसे रॉयल जुलूस देखने कई रियासतों से लोग आते थे। इसके बाद कुलदेवी मांढरे की माता जाकर शमी पूजन होता था। इस उत्सव में राजा सिंधिया के अंग्रेज दोस्त खासतौर पर बुलाए जाते थे। बाजारों और छज्जों पर पैर रखने की जगह नहीं होती थी। आजादी से पहले स्टेट पीरियड में ग्वालियर में दशहरे के दिन शहर में शाही रंग बिखरते थे।
शुरूआत होती थी जयविलास पैलेस से....
इस दशहरे पर राजवंश की शुरूआत जयविलास पैलेस से होती थी।
- 18 घोड़ों वाली बग्घी पर महाराज के साथ मराठा सरदार बैठते थे। इस दौरान उनकी सेफ्टी के लिए हथियारबंद सैनिक चलते थे।
- ब्रिटिश सरकार का कोई अफसर शहर में होता था, तो महाराज सिंधिया उसे भी रॉयल दशहरे में अपने साथ शामिल कर लेते थे।
- शाही काफिला पैलेस से निकलकर लश्कर की सड़कों पर होते हुए सीधे महाराज बाड़े पर पहुंचता था।
- महाराज बाड़े से रॉयल सवारी हाथी पर आ जाती थी, सिंधिया महाराज हाथी पर सवार होकर गोरखी पैलेस पहुंचते थे।
- यहां महाराज अपने कुलदेवता के मंदिर में पूजा करते थे।
- इसी मंदिर में शस्त्रों का पूजन भी की जाती थी। इसके बाद मराठा सरदार रॉयल अंदाज में मुजरे के साथ महाराज का करते।
गोरखी के कुल देवता मंदिर में शस्त्र पूजन के बाद महाराज बाड़े पर सैनिकों की ड्रिल होती थी।
- इस रॉयल जुलूस को देखने के लिए लोग महाराज बाड़े पर और परिवार की महिलाएं और बच्चे छतों पर चढ़ जाते थे।
- यहां से महाराज हाथी पर सवार होकर सीधे मांढरे की माता पहुंचते थे। जहां पर शमी पेड़ की पूजा की जाती थी। पूजा के दौरान मराठा सरदार फिर से मुजरा करते थे।
- महाराज स्वर्णमुद्रा के प्रतीक के तौर पर शमी पे़ड़ के पत्ते सरदारों और वहां मौजूद रियासत की जनता को बांटते थे।
दशहरे के दिन दानवीर दानव राज बलि ने अपनी प्रजा को शमी वृक्ष पर बैठ कर ही स्वर्ण मुद्राओं का पूरा खजाना लुटा दिया था।
- इसलिए सिंधिया राजवंश इस परंपरा को निभाता आ रहा है।

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