ऐसी है 600 साल पुरानी दशहरें की कहानी, आदिवासी करते हैं महल में चोरी
बस्तर यहां दुनिया में सबसे लंबे समय तक दशहरा मनाया जाता है। यह उत्सव 75 दिन तक चलता है। विजयादशमी पर जहां पूरी दुनिया रावण का दहन करेगी तो वहीं बस्तर में विजय रथ चलाया जाएगा। विजयादशमी पर आदिवासी लकड़ी के बड़े रथ को चुराकर कुम्हड़ाकोट ले जाएंगेे। इसे ‘भीतर रैनी’ रस्म कहा जाता है।
ऐसे बनी परंपरा...
रथ चुराने के लिए किलेपाल, गढ़िया और करेकोट परगना के 55 गांवों के हजारों लोग आते हैं जो राजा के प्रति नाराजगी प्रकट करते हैं। कहा जाता है राजशाही के दौर में कभी आदिवासियों को दशहरा की भागीदारी में सम्मान नहीं मिला था।
- इससे नाराज होकर आदिवासियों ने रथ चुरा लिया था। तब से यह परंपरा बन गई है। रविवार को राजा कुम्हड़ाकोट पहुंचेंगे और रथ चुराने वाले लोगों के साथ खाना खाकर उनकी नाराजगी दूर करेंगे। इसके बाद रविवार को रथ वापस जगदलपुर लाएंगे। अब राजा की जगह मां दंतेश्वरी का छत्र रखा जाता है।
- बस्तर दशहरा इसलिए भी अनोखा है क्योंकि पिछले 603 साल से दशहरे में चलने वाले रथ के आकार में कोई फर्क ही नहीं आया है।
- यह लकड़ी का रथ 25 फीट ऊंचा, 18 फीट चौड़ा और 32 फीट लंबा ही बनाया जाता है।
- ग्रामीण अपने हाथों से रथ बनाते हैं। आधुनिक औजारों और मशीनों का इस्तेमाल नहीं करते हैं यह बारिश से शुरू होकर सर्दी की शुरुआत तक चलता है
- इस साल बस्तर दशहरे की पहली रस्म जिसे पाट जात्रा भी कहा जाता है 23 जुलाई को हुई थी। दशहरे का समापन अगले महीने 7 अक्टूबर को दंतेश्वरी माई की विदाई के साथ खत्म होगा।


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