यहां 11वीं शताब्दी से ऐसे बनाया जा रहा है कागज, विदेशों में है डिमांड
यहां कालपी में 11वीं शताब्दी से हाथों से कागज बनाया जाता है। इससे कुटीर उद्योगों को महत्व तो मिलता ही है साथ काफी लोगों को रोजगार देने का काम होता है। अब जीएसटी की मार से यह कागज उद्योग बंद होने की कगार पर पहुंचने वाला है।
इस व्यापार से जुड़े अभिषेक गुप्ता ने कहा, ''यहां मजदूर पुराने कपड़ों के साथ सूती कपड़े की कटन और खराब अखबार जैसी चीजों को बड़े-बड़े हौदो (ड्रम) में कई दिनों तक गलाते है, फिर उसे बीटर नामक मशीन में पीसते हैं।''
- ''उसके बाद कारीगरों के द्वारा पीसे हुए कागज को हौजों में डाल कर उसको मशीन के माध्यम से नया कागज बनाया जाता है। गीले कागज को धूप में सुखाया जाता है।''
- ''इसके बाद कागज को अलग-अलग रंगों से रंगाई का काम किया जाता है। इसके बाद ही इसे बाजार में बिकने के लिए भेजा जाता है।''
जब कागज फैक्ट्री लगी थी तो यूपी सरकार ने सभी फैक्ट्रियों को बिजली की सब्सिडी दी थी लेकिन धीरे-धीरे सरकार ने सब्सिडी बंद कर दी। इसके अलावा बिजली कटौती कर दी, जिससे कागज का उत्पादन कम होने लगा। बाद में जीएसटी की मार भी व्यापारियों के लिए मुसीबत बन गया।
- जुलाई में मोदी सरकार ने हैंडमेड कागज पर 12 प्रतिशत टैक्स रखा। जिससे व्यापारी एक बार फिर परेशान हो गए। अब आमदनी घटने के साथ उन्हें टैक्स की भी मार झेलनी पड़ रही है।
- यूपी हस्तनिर्मित कागज संघ के पदाधिकारी सुनीत गुप्ता ने कहा, ''जीएसटी के पहले 50 फैक्ट्रियां लगभग १,1 करोड़ का सालभर का व्यापार कर लेती थी लेकिन जीएसटी के बाद 50 फैक्ट्रियों की इनकम केवल १५,20 करोड़ ही रहा गई है। जिसमें 70 फीसदी की गिरावट आई है।''
- ''अगर सरकार जीएसटी में सुधार करे तो व्यापारियों को फायदा मिलेगा। इसके अलावा बिजली में भी सरकार 50 फीसदी सब्सिडी दें। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए।''
- ''कालपी के बने कागज मुगलों एवं चंदेल कालीन राजसत्ता से ही प्रसिद्ध है और ये कागज अब ज्यादातर लोगों के शादी-विवाहों में छपने वाले मैरिज कार्डो एवं फाइलों के कवर बनाने के काम आता है।''
- इन पेपर मिल के मालिक देवेंद्र गुप्ता ने कहा, ''कच्चे माल की स्थिति जीएसटी के बाद ठीक है लेकिन बीच में स्थिति गड़बड़ हो गई थी। सरकार को मदद करनी चाहिए और टैक्स में छूट देनी चाहिए।''

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