योग तंत्र का है ये अनोखा मंदिर, शून्य की आराधना से मिलती थी मुक्ति
पुरातत्व विभाग रविवार से वाराणसी में विश्व धरोहर सप्ताह मना रहा है। जहां कभी गुरु से ईश्वर की प्राप्ति और ईश्वर से व्योम यानी शून्य की प्राप्ति कर लोग जीवन से मुक्ति पाते थे। बताया जाता है कि ये 18वीं शताब्दी का सबसे बड़ा तंत्र साधना का योग मंदिर हुआ करता था। यह देश का पहला अनोखा शून्य मंदिर यानी गुरुधाम मंदिर है, जो अष्टकोणीय है। योग और तंत्र साधना के दृष्टि से बना इस तीन मंजिले मंदिर में कई रहस्य आज भी छिपे हैं। इतिहासकार से लेकर सरकारी अमला आज भी इस रहस्य को जानने में लगा है कि आखिर तंत्र और योग की वो कौन सी साधनाएं थी जिससे व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करता था। आगे पढ़िए क्या कहते हैं
-क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी सुभाष यादव ने बताया, भेलूपुर के गुरुधाम कॉलोनी में इस मंदिर का निर्माण 1814 में महराजा जयनारायण घोसाल ने करवाया था।
-उस वक्त ये मंदिर 84 बीघे में था। प्रथम तल पर गुरु वशिष्ठ और अरुंधति की मूर्ति स्थापित थी। दूसरे तल पर राधा-कृष्ण और तीसरे तल पर व्योम यानी शून्य का प्रतिक मंदिर है। इस मंदिर का मुख्य उद्देश्य गुरु के सानिध्य से ईश्वर की प्राप्ति और ईश्वर से व्योम यानी मोक्ष की प्राप्ति संभव होती है।
-इस मंदिर में कभी 8 द्वार हुआ करते थे। जिसके नाम पर इसे अष्टकोणीय मंदिर भी कहा जाता था। इन 8 द्वार में से एक गुरु द्वार था और बाकी 7 सप्तपुरियों के नाम से था। जिनके नाम अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांची, अवंतिका और पूरी के नाम से थे।
-योग और तंत्र साधना के भाव से बने ऐसे मंदिर भारत में दो जगहों पर है। जिसमें से एक बंगाल के हतेश्वरी में और दूसरा दक्षिण भारत के भदलुर में स्थित है।
मंदिर के गर्भ गृह के बाहर पत्थर के 32 खंभे हैं
-इस मंदिर के भूतल में गर्भ गृह के बाहर पत्थर के 32 खम्भे, जबकि गर्भ गृह में 24 खम्भे लगे हैं। इसकी छत 53 धरन (बिंब) पर टीकी है।
-गर्भ गृह के तीनों तल में ४,4 दरवाजे हैं। मंदिर के पिछले भाग में योग साधना के लिए 32 खम्भों की बारादरी भी है। यहीं पर 6 छोटे-छोटे पत्थर के ताखे भी हैं जिनका इस्तेमाल अनुमानतः मौन साधना के लिए किया जाता था।
-कभी इसमें ऊपर जाने के लिए अलग-अलग 8 गैलरी हुआ करती थी जिससे व्यक्ति अपने हिसाब से किसी भी द्वार पर पहुंच सकता था।

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