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कॉलेज के चारो तरफ खुदी हैं सुरंगें, बच्चों को है मौत का डर फिर भी आते हैं पढ़ने




करीब 100 फीट गहरी कोयला खदानों के बीच, यह तस्वीर आदिवासी इंटर कॉलेज ललमटिया की है। इसे कोयला खा रहा है। राजधानी रांची से 380 किलोमीटर दूर इस कॉलेज में आर्ट्स विषय में 11वीं,12वीं की पढ़ाई होती है। 500 स्टूडेंट्स और 25 स्टाफ हैं। कॉलेज के नीचे की जमीन हो चुकी है खोखली, कभी भी धंस सकती है।


मगर सब डरे रहते हैं कि न जाने कब कॉलेज खदानों में समा जाए। क्योंकि कॉलेज व खदान के बीच सिर्फ १०,12 फीट का अंतर बचा है। लगातार मिट्‌टी कटने से वह भी कम हो रहा है। हर दिन सिर्फ गिने-चुने स्टूडेंट्स ही आते हैं। बाकी ने डर की वजह सेे कॉलेज आना छोड़ दिया है। वे सिर्फ परीक्षा देने आते हैं।

कॉलेज को शिफ्ट करने की प्रक्रिया २०१३, ,से शुरू हुई थी, मगर अब तक पूरी नहीं हुई। इस बीच हर दिन कॉलेज की हालत खराब होती चली गई। चापाकल सूख गया है। पीने के लिए एक बूंद पानी भी नहीं मिलता। शौचालय भी बंद है। फिर भी बच्चे पढ़ रहे हैं, क्योंकि इलाके का यह इकलौता इंटर कॉलेज है। प्राचार्य बासुकीनाथ गुप्ता ने कहा कि २०१३, से शिफ्टिंग के लिए पत्राचार कर रहे हैं।

ईसीएल प्रबंधन ने जमीन-फंड आवंटन भी किया, लेकिन स्थानीय अफसर टांग अड़ा रहे हैं। एक नवंबर 2017 को भी ईसीएल को पत्र भेजा है। गोड्डा के डीसी, एसडीओ, एसपी, डीईओ समेत कई अफसर बात नहीं सुन रहे।


झारखंड में कोल माफिया के हाथ शिक्षा की गिरेबान तक पहुंच गए हैं। सरकार मौन है, शिक्षा विभाग सो रहा है और कोल इंडिया ने माफिया को लूट की छूट दे रखी है। 1985 में गोड्‌डा जिले के ललमटिया गांव में आदिवासी बच्चों को पढ़ाने के पवित्र उद्देश्य से इंटर कॉलेज की स्थापना हुई। तब किसी को यह अंदाजा नहीं था कि एक दिन इस कॉलेज को कोयला ही खा जाएगा। खा जाएगा नहीं, खा ही गया। आज कॉलेज के शिक्षक-छात्र मांग कर रहे हैं कि उन्हें कहीं और स्थापित किया जाए, पर सरकार ने माफिया पर शिकंजा कसने और शिक्षा की कीमत पर माइनिंग रोकने का काम नहीं किया।


कॉलेज एक माइनिंग टापू में तब्दील हो चुका है। मैदान खनन की भेंट चढ़ गए हैं। इंतजार है कि कब कॉलेज भवन खदान में समा जाए। करीब 500 छात्रों का भविष्य खतरे में है और सरकार काे पता ही नहीं, यह शर्मनाक है।

कॉलेज बिल्डिंग के नीचे दोनों तरफ कई गहरी सुरंगें भी दिखीं। भास्कर टीम भी इन सुरंगों तक गई। यहां से कोल माफिया व चोर हर रात कोयला निकालते हैं। १०,l12 सुरंगें बनी हैं, जिनकी चौड़ाई 15 और लंबाई 35 फीट तक है। ज्यादा खुदाई या जोरदार ब्लास्ट हो तो कॉलेज ढह जाएगा। डेढ़ किमी दूर लौहंडिया गांव में नया कॉलेज भवन बनाने के लिए ईसीएल दो एकड़ जमीन अलॉट कर चुका है। नक्शा पास है। ढाई करोड़ रु. भी स्वीकृत हैं, लेकिन काम की शुरुआत नहीं हो रही। कॉलेज प्रबंधन का आरोप है कि ईसीएल व जिला प्रशासन के लोकल अफसरों की मिलीभगत के कारण काम शुरू नहीं हो रहा है। पिछले साल दिसंबर में इसी इलाके में कोयला खदान धंसने से 23 लोग मारे गए थे। ईसीएल के बड़े अफसरों की टीम भी पहुंची थी। यह तय किया गया था कि भविष्य में ऐसी घटना दोबारा न हो पाए।



12वीं के स्टूडेंट्स अन्नू कुमारी, अंजू कुमारी और राजीव कुमार ने कहा कि दो किमी दूर लौहंडिया गांव से आते हैं। रोज डर लगा रहता है कि न जाने कब कॉलेज खदान में गिर जाए। इसलिए पढ़ाई से ध्यान भटकता है। कोई दूसरा इंटर कॉलेज न होने के कारण यहां पढ़ना मजबूरी है। कई बच्चों ने डर से कॉलेज आना ही छोड़ दिया है। वे सिर्फ एग्जाम देने आते हैं।



इंटर कॉलेज की दीवार और खदान के बीच 10 फीट का अंतर रह गया है। मिट्टी धंसी तो कॉलेज का नामोनिशान भी नहीं बचेगा। माफिया और चोर भी कोयला खोद-खोदकर जमीन का बचा-खुचा आधार खत्म कर रहे हैं। शिक्षक शिव रामकृष्ण ने कहा कि मैं रोज कॉलेज से लगी खदान में उतरता हूं, ताकि अवैध सुरंगों की स्थिति पता कर सकूं।



ईसीएल के सीजीएम एके झा और जीएम संजय कुमार (राजमहल परियोजना) से पक्ष जानने के लिए उनके मोबाइल पर कई बार कॉल किया। लेकिन दोनों ने फोन रिसीव नहीं किया। सीजीएम को वाट्सएप पर सवाल भी भेजा गया और उन्होंने इसे देखा भी, परंतु जवाब नहीं दिया। यही रवैया गोड्‌डा के डीसी डॉ. भुवनेश प्रताप सिंह भी अपनाए हुए हैं।



ईसीएल और शिक्षा विभाग कोे स्पॉट चयन करना है जो वे नहीं कर पाए हैं। हमें तो ईसीएल ने बताया कि स्पॉट का चयन नहीं हुआ है। लगता है जल्द ही शिफ्टिंग हो जाएगी। हालांकि सरकारी जमीन प्राप्त करने का आवेदन नहीं मिला है।



हमें इतनी गंभीर परिस्थिति की जानकारी नहीं थी। हम जिला प्रशासन की टीम से इसकी जांच कराकर तत्काल कार्रवाई करेंगे। ये गंभीर मामला है, मैं गोड्‌डा डीसी और ईसीएल अिधकारियों से इस बारे में बात करूंगी।