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वजन घटाने के लिए शरीर पर आग लगवाने तक को मजबूर चीन का ये बच्चा, दुर्लभ बीमारी से है पीड़ित

चीन में एक 11 साल का बच्चा अपना वज़न कम करने के लिए हरसंभव प्रयत्न कर रहा है और इसके लिए उसके परिवार वाले चीन की पारंपरिक लेकिन खतरनाक तकनीकों को अपनाने से भी गुरेज़ नहीं कर रहे हैं.

11 साल की उम्र और लगभग 166 किलो वजन का यह बच्चा प्रेडर विली सिंड्रोम से पीड़ित है. यह एक दुर्लभ जेनेटिक डिसॉर्डर है, जिसमें पीड़ित को बेतहाशा भूख लगती है, चीज़ें सीखने में कठिनाइयां आती हैं और उसके शारीरिक विकास में काफी बाधा आ सकती है.

ली जब 4 साल का था, तभी उसका वज़न 42 किलो पहुंच गया था जो आम बच्चों के मुकाबले ढाई गुना ज्यादा था. चीन के नेशनल हेल्थ और फैमिली प्लानिंग कमीशन के हिसाब से 4 साल के सामान्य बच्चे का वज़न 16 किलो के आस-पास होना चाहिए.

ली हॉन्ग का वज़न बीते कुछ सालों में बेहद नाटकीय ढंग से बढ़ा है और बढ़ते मोटापे की वजह से वह कई और बीमारियों की भी चपेट में आता रहा है. हालांकि डॉक्टर समय-समय पर इन बीमारियों का इलाज करते रहे हैं.


मार्च 2016 में 5 फीट लंबे ली का वजन लगभग 166 किलो था. ली के परिवार ने उसे जिम जाकर वज़न घटाने को लेकर काफी प्रोत्साहित किया, लेकिन ली के कई बार प्रयास करने के बावजूद वो ऐसा करने में नाकाम रहा.

ली की फैमिली इसके बाद उसे बेहतर इलाज की उम्मीद में पारंपरिक चीनी अस्पताल ले आई. गौरतलब है कि चांगचुन शहर में मौजूद इस अस्पताल को मोटापे से संबंधित बीमारियों के खास इलाज के लिए जाना जाता है. यहां इलाज कराने पहुंचे 53 लोगों में से 7 तो बेहद छोटे बच्चे हैं.

25 नवंबर को ली गई इन तस्वीरों से साफ जाहिर होता है कि अस्पताल ने ली हॉन्ग पर कई पारंपरिक चीनी तकनीक जैसे फायर कपिंग, फायर थेरेपी और एक्यूपंक्चर का इस्तेमाल किया है और चीन की इस पारंपरिक तकनीक से पिछले दो महीनों में ली ने 15 किलो वज़न कम करने का दावा किया है.

गौरतलब है कि इंग्लैंड में हर 15000 बच्चों में एक बच्चा इस दुर्लभ बीमारी से ग्रस्त है. शरीर में क्रोमोसोम नं 15 में खराबी आने के चलते लोगों में ये समस्या आती है और चूंकि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है, इसलिए ऐसे बच्चों के मां-बाप को खासतौर पर पौष्टिक और बैलेंस डाइट की अहमियत समझाई जाती है ताकि बच्चे खराब डाइट से बचकर अपने शरीर का कम से कम नुकसान करें.

इस बीमारी से पीड़ित बच्चे अपनी उम्र के बच्चों के मुकाबले छह गुना ज्यादा खाना खाते हैं और इसके बावजूद इनकी भूख नहीं मिटती है. 1956 में इस बीमारी के बारे में सबसे पहले स्विस डॉक्टर ए. प्रादेर, ए. लाबार्ड और एच. विली ने बताया था.

दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर चीन को तमाम चुनौतियों के बीच मोटापे की चुनौती से भी दो-चार होना पड़ रहा है. 1985 से 2010 के बीच चीन में मोटापे से ग्रस्त लोगों की तादाद 1.11 प्रतिशत से 9.62 प्रतिशत हो गई है और अगले दशक तक देश में 48 मिलियन बच्चे मोटापे से ग्रस्त हो सकते हैं. जाहिर है, दुनिया की महाशक्ति बनने की राह में ये अस्वस्थ बच्चे चीन के लिए परेशानी साबित हो सकते हैं.