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बीआर चोपड़ा से किशोर कुमार ने ऐसे लिया था बदला, नहीं था बैंक पर भरोसा


13 अक्टबूर को किशोर कुमार की पुण्यतिथि है। किशोर की सनक के एक से बढ़कर एक सैकड़ों किस्से हैं। जिनसे सामने वाला चाहे कितना भी परेशान क्यों न हुआ हो, लेकिन आज के लोग सुनें तो हंसे बगैर नहीं रह पाएंगे।

इस पैकेज में ऐसे ही कुछ किस्से बताए जा रहे हैं। किशोर दा के ‘विनोदी’ स्वभाव का शिकार एक बार मशहूर फिल्मकार बलदेव राज चोपड़ा भी हुए थे।

दरअसल एक बार बी. आर चोपड़ा अशोक कुमार के पास गए और बोले कि वो किशोर को अपनी फिल्म में लेने चाहते हैं लेकिन किशोर ने एक शर्त रख दी है।

 इस पर अशोक ने शर्त पूछने के तुरंत बाद किशोर को फोन लगाया और कहा, "तुझे चोपड़ा जी की फिल्म में काम नहीं करना है क्या।"

इस पर किशोर का जवाब था, "मैंने मना नहीं किया, लेकिन बस वो मेरी शर्त मान लें।" क्या थी वो शर्त...

दरअसल, अशोक कुमार और बीआर चोपड़ा शुरू से ही दोस्त थे। लेकिन जब पारिवारिक रिश्ते के चलते किशोर चोपड़ा के पास कामने मांगने गए तो उन्होंने कुछ शर्तें रख दी।

 इसके बाद किशोर ने कहा कि आज मेरा बुरा वक्त है तो आप शर्त रख रहे हैं, जब मेरा वक्त आएगा तो मैं शर्त रखूंगा। इस बात को बाकी सब तो भूल गए थे, लेकिन किशोर दा नहीं।

जब बीआर चोपड़ा उनके पास अपनी फिल्म के लिए आए तो किशोर ने अपनी शर्त रख दी। किशोर की शर्त थी कि आप धोती पहनने के साथ ही अपने पैरों में मोजे और जूते डालकर आएं!

 मुझे साइन करने के लिए पान खाकर आइए। वह भी ऐसे कि लार टपकी हुई हो, जिससे आपका मुंह लाल-लाल नज़र आए। गौरतलब है कि चोपड़ा न तो पान खाते थे और न ही धोती पहनते थे।

इसलिए नहीं था बैंक पर भरोसा

किशोर दा एक मस्तमौला कलाकार थे यानी हरफनमौला शख्सियत। इनकी सोच और फितरत के किस्से भी काफी मजेदार हैं।

 असल में पर्दे पर ही नहीं, उनकी चुहलबाजियां पर्दे के पीछे कहीं ज्यादा थीं। सब कुछ बड़े साफ दिल से कहते-करते थे।

 लेकिन धन के लेन-देन में कुछ ज्यादा ही सावधानी बरतते थे, मसलन- किसी को हजार या पांच सौ का भी चेक दिया तो अपने नौकर को फौरन पास बुलाते।

फिर उतनी ही रकम देकर यह कहते हुए उसे बैंक में भेजते- ‘जाओ, यह मेरे अकाउंट में जमा कर आओ।’ एक दिन किसी ने पूछ लिया- ‘दादा, आप ऐसा क्यों करते हैं?’ किशोर दा का जवाब था- ‘माना कि मेरे पड़ोस में नेशनलाइज बैंक है, मगर किसी के ऊपर कभी पूरा भरोसा मत करो।

 अगर बैंक में कभी आग लग गई तो? चलिए, वह लुट ही गई तो क्या होगा? इसलिए यह मानकर चलो कि जो पैसे आपकी जेब (तिजोरी) में हैं, वास्तव में वही आपके हैं, बाकी सब मिथ्या है।

’ अपने इस रवैये पर उन्हें गुमान भी बहुत था और कहते थे, ‘मैं बेवकूफ थोड़े ही हूं।’

जब पार्क में भाषण देने की थी इच्छा...

सुना है कि एक बार जब वे जुहू के अपने बंगले से ताड़देव जा रहे थे, तब गाड़ी अब्दुल्ला चला रहा था। वही अब्दुल्ला, जो दादा का ड्राइवर-सेक्रेटरी, सब कुछ था।

दादा उस समय फिएट की अगली सीट पर बैठे कुछ गुनगुना रहे थे कि गाड़ी दादर में शिवाजी पार्क के सामने से गुजरी।

 दादा अचानक मुड़कर पीछे बैठे दोस्त से कहने लगे- ‘मेरी इच्छा है कि मैं इस पार्क में भाषण दूं।’ टॉपिक क्या होगा? इसके जवाब में दादा बोले- ‘मैं भगवान कृष्ण को कटघरे में खड़ा कर दूंगा!’

 अपने दोस्त के चेहरे पर उभरे हैरानी के भाव को पढ़ते हुए उन्होंने स्पष्ट किया- ‘संभव है कि पचास की उम्र पार कर चुके लोग मेरे ऊपर गोबर फेंकें, लेकिन यकीन है कि मेरी बात मानकर पचास के अंदर वाले मुझे फूल-माला पहनाएंगे।

 अरे भाई, मैं जानना चाहता हूं कि कृष्ण ने 16 हजार गोपिकाओं संग रास कैसे रचाया? किसी एक पुरुष के लिए यह मुमकिन नहीं है।’

तवज्जो न दो तो नराज हो जाते थे...

दरअसल, किशोर दा की खासियत की बात की जाए तो उन्हें अपनी बातों के जवाब में सामने वाले की हुंकारी सुनना खूब पसंद था।
ऐसा लगना जरूरी था कि आप उनकी बातों को तवज्जो दे रहे हैं, अन्यथा वे नाराज हो जाया करते थे।