आमिर के चाचा से था इस एक्ट्रेस का अफेयर, इस वजह से नहीं हो पाई शादी
लीजेंडरी एक्ट्रेस आज अपना 75वां बर्थडे (2 अक्टूबर) सेलिब्रेट कर रही हैं। बॉलीवुड की कई सुपरहिट फिल्मों में काम करने वाली आशा पारेख ने कभी शादी नहीं की।
हां, उनका अफेयर के चाचा फिल्ममेकर नासिर हुसैन के साथ रहा, लेकिन दोनों की ही फैमिली के सम्मान को ध्यान में रखते हुए उन्होंने शादी नहीं की। हालांकि, नासिर हुसैन अब इस दुनिया में नहीं है। खुद कबूला था अफेयर...
आशा ने एक इंटरव्यू में बताया था, 'हां, नासिर साहब ही एकमात्र ऐसे मर्द थे जिनसे मैंने प्यार किया। मैं कभी भी घर तोड़ने वाली नहीं रही। मेरे और नासिर साहब की फैमिली के बीच कभी कोई अनबन नहीं हुई।
मैं कभी हुसैन को उनकी फैमिली से अलग नहीं करना चाहती थीं, और इसी डर से मैंने शादी नहीं की'। उन्होंने बताया, 'मेरी मां चाहती थी कि मेरी शादी किसी तरह से हो जाए। उस वक्त उन्होंने कोशिश भी की लेकिन ऐसा हो नहीं पाया।
मेरी इच्छा थी कि मैं शादी तब करूं जब मुझे मेरा मनपसंद साथी मिले। ऐसा नहीं हुआ, इसलिए मैंने शादी नहीं की।
आशा पारेख ने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट फिल्मों में अपना करियर शुरू किया था। 10 साल की उम्र में डायरेक्टर बिमल रॉय ने आशा को एक फंक्शन में डांस करते देखा था। और उन्हें फिल्म में काम करने का ऑफर दे दिया।
उन्होंने 1952 में आई फिल्म 'मां' से सिल्वर स्क्रीन पर कदम रखा था। इसके बाद में 1954 में आई फिल्म 'बाप बेटी' में भी नजर आईं। कुछ और फिल्मों में काम करने के बाद उन्हें खास सफलता नहीं और उन्होंने एक्टिंग छोड़कर दोबारा स्कूल ज्वाइन किया।
16 साल की उम्र में उन्होंने दोबारा एक्टिंग में किस्मत आजमाने की सोची।
बतौर एक्ट्रेस उन्हें विजय भट्ट की फिल्म 'गूंज उठी शहनाई' (1959) में काम करने का मौका मिला। लेकिन डायरेक्टर ने ये कहकर उन्हें फिल्म से निकाल दिया कि उनमें स्टार बनने की क्वालिटी नहीं है।
उनकी जगह इस फिल्म में अमिता को लिया गया। फिल्म से निकाले जाने के हफ्ते भर बाद उन्हें राइटर-डायरेक्टर नासिर हुसैन ने फिल्म 'दिल देके देखो' (1959) के लिए कास्ट किया। फिल्म में उनके को-स्टार शम्मी कपूर थे।
ये फिल्म हिट रही और आशा पारेख रातों-रात स्टार बन गईं। इस फिल्म के बाद नासिर हुसैन ने आशा को अपनी 6 फिल्मों 'जब प्यार किसी से होता है' (1961), 'फिर वो ही दिल लाया हूं' (1963), 'तीसरी मंजिल' (1966), 'बहारों के सपने' (1967), 'प्यार का मौसम' (1969) और 'कारवां' (1971) के लिए साइन किया था। ये सभी फिल्मों हिट रही थीं।
1976 तक उन्होंने फिल्मों में लीड एक्ट्रेस का रोल प्ले किया। इसके बाद उन्हें लीड रोल मिलना बंद हो गए और वे फिल्मों में सपोर्टिंग रोल करने लगी। 1995 में उन्होंने एक्टिंग को अलविदा कह दिया।
उन्होंने प्रोडक्शन कंपनी आकृति बनाई और इसके तहत टीवी सीरियल 'पलाश के फूल', 'बाजे पायल', 'कोरा कागज' और 'दाल में काला' जैसे शोज का प्रोडक्शन किया। वे सेंसर बोर्ड की पहली महिला चेयरपर्सन बनीं।
आशा ने एक इंटरव्यू में बताया, 'माता-पिता की मौत के बाद मैं एकदम अकेली हो गई थीं। सभी चीजें मुझे अकेले ही मैनेज करनी पड़ती थी। इसी वजह से मैं डिप्रेशन में चली गई थी।
इतना ही इस दौरान मुझे सुसाइड करने का विचार भी आया। लेकिन, मैंने अपना इलाज करवाया और डिप्रेशन से बाहर आ पाई'। उन्होंने बताया, एक एक्टर को उसके फैन्स बहुत प्यार देते है, इसके बावजूद वो अकेलापन महसूस करता है।
आशा पारेख ने जहां एक ओर कई हिट फिल्मों में काम किया, वहीं उन्होंने कुछ फिल्मों में काम करने से भी मना किया, जो सुपरहिट रही थी।
उन्होंने 'अंदाज' (1971), 'तुमसा नहीं देखा' (1969), 'सीता और गीता' (1972), 'आराधना' (1969) फिल्म में काम करने से मना किया था। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया कि फिल्म 'आराधना' में काम करने से उन्होंने इसलिए मना किया क्योंकि उस वक्त वे लीड एक्ट्रेस और मां दोनों का रोल प्ले करने का रिस्क नहीं लेना चाहती थीं।
हालांकि, बाद में उन्हें फिल्म में काम न करने को अफसोस हुआ था।
आशा की ऑटोबायोग्राफी 'द हिट गर्ल' इसी साल लॉन्च हुई है। इसे उन्होंने जर्नलिस्ट खालिद मोहम्मद के साथ मिलकर लिखा है।
उनसे जब पूछा गया कि यदि आपकी बायोपिक बने तो किसे चाहेंगी आपका रोल निभाएं, तो उनका कहना था, वे चाहती है कि दीपिका पादुकोण, प्रियंका चोपड़ा या फिर आलिया भट्ट उनका किरदार निभाएं।


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