वो नेता जो जेल में रहते हुए बंबई का मेयर बना, जिसका जिक्र PM मोदी ने इस बार 15 अगस्त को किया था
देश की आजादी में तमाम महान नेताओं का योगदान रहा है। हर नेता के आजादी में अपने योगदान के साथ उनका एक खास किस्म का नारा भी होता था, जिसे जनता फॉलो करते हुए उन नेताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती थी।
जैसे सुभाष चंद्र बोस का तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा। गांधी जी का अंग्रेजों भारत छोड़ो । उस दौरान नेताओं का नारा ही अपने आप में ही पूरा वाक्य होता था, जिसे बोलकर ही इंसान की पूरी मंशा को समझा जा सकता है।
इसी तरह और कई लोगों ने अलग-अलग नारे दिए। जिनमें एक नारा यह भी खास था साइमन गो बैक, 'भारत छोड़ो' । जिसे स्वतंत्रता सेनानी युसूफ मेहर अली ने दिया था। जिसका जिक्र पीएम मोदी ने इस बार 15 अगस्त को मौके पर उन्हें याद करते हुए किया था ।
1928-29 में यह नारा वंदेमातरम् की तरह हर इंसान के होठों पर था। मुम्बई के समाजवादी नौजवान यूसुफ मेहर अली ने यह नारा सबसे पहले लगाया था जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दी थी। यूसुफ मेहर अली का जन्म बंबई के सम्पन्न मुस्लिम बोहरा परिवार में 23 सितम्बर, 1903 को हुआ ।
उनकी पढ़ाई बोरीबंदर के न्यू हाईस्कूल में हुई। बाद में सेंट जेवियर कालेज और एल्फिंस्टन कालेज में पढ़ाई के दौरान वाद-विवाद, ड्रामा और कविता में उनके टैलेंट से उनके साथ पढ़ने वाले दोस्त और टीचर्स बहुत प्रभावित हुए।
8 अगस्त, 1925 को इतिहास और अर्थशास्त्र में B.A करने के बाद उन्होंने 26 जनवरी, 1929 को कानून की डिग्री हासिल की। अपने छात्र जीवन से ही यूसुफ राजनीतिक गतिविधियों में दिलचस्पी लेने लगे थे।
वे बाम्बे स्टूडेंट ब्रदर हुड संगठन में शामिल हुए, जिसने 20 मई, 1928 को बंबई के ओपेरा हाउस में एक सभा का आयोजन किया, इसे जवाहर लाल नेहरू और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने भी संबोधित किया।
सुभाष चन्द्र बोस के भाषणों से प्रभावित होकर युसूफ राष्ट्रभक्त युवाओं की संस्था यूथ लीग के सदस्य बन गए। फिर बाद में उसके सचिव भी बने। सचिव बनने के कारण विश्व शांति युवा कांग्रेस में भाग लेने वे हालैंड गए।
यूसुफ ने छात्रों और श्रमिकों के बीच अपनी गतिविधियां जारी रखी। कॉलेज में फीस वृद्धि और बंगलुरु में छात्रों पर पुलिस की गोलीबारी के विरोध और हड़ताली मिल मजदूरों के समर्थन में जनसभाएं आयोजित कर उन्होंने अपनी संगठन क्षमता का परिचय दिया।
उनकी इन राजनीतिक गतिविधियों का परिणाम यह हुआ कि उन्हें बंबई उच्च न्यायालय में एडवोकेट की हैसियत से प्रैक्टिस करने पर बैन कर दिया। दिसम्बर, 1927 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने साइमन कमीशन के बहिष्कार का प्रस्ताव पारित किया।
3 फरवरी, 1928 की रात में बंबई के मोल बंदरगाह पर पानी के जहाज से साइमन कमीशन के सदस्य उतरे। तभी समाजवादी नौजवान यूसुफ मेहर अली ने नारा लगाया साइमन गो बैक और हजारों लोगों ने उसके साथ यह नारा लगाया।
इन प्रदर्शनकारियों पर जमकर लाठियां बरसाई गयी। यूसुफ ने लाठीचार्ज करने वाले अंग्रेज पर मुकदमा कर दिया जिस पर अदालत ने 100 रूपए का जुर्माना लगा दिया। यह उनकी बड़ी जीत थी।
यूसुफ मेहर अली ने यूथ लीग के सदस्यों के साथ पूरी बंबई में साइमन कमीशन के खिलाफ पोस्टर चिपकाए। जगह-जगह साइमन गो बैक का नारा गूंजने लगा। बंबई के ग्रांट रोड पर हजारों लोगों के विरोध प्रदर्शन के बीच यूसुफ को पुलिस ने लहूलुहान कर गिरफ्तार कर लिया।
साइमन कमीशन के विरोध की लहर पूरे देश में फैल गई। बाम्बे प्रेसीडेंसी यूथ लीग का दूसरा सम्मेलन जो 12-13 सितम्बर 1928 को पुणे में हुआ, यूसुफ मेहर अली के कारण पूर्ण स्वराज को राष्ट्र का तात्कालिक लक्ष्य घोषित करने की मांग की गई।
बाद में कांग्रेस ने लाहौर अधिवेशन में इसे अपनाया। इसके बाद तो युसूफ मेहर अली हर आंदोलन के अगुआ बनते चले गए। गांधीजी के आह्वान पर विदेशी सामानों की होली जलाने के आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हुए उन्होंने बंबई में एक स्वदेशी बाजार लगाया। मेरठ कांड के क्रांतिकारियों के लिए चन्दा जुटाया।
क्रांतिकारी जतिनदास की लाहौर जेल में 60 दिन के अनशन के बाद मौत पर यूथ लीग ने एक विशाल जुलूस निकालकर अंग्रेजी साम्राज्य विरोधी नारे लगाए। पुलिस ने लाठियां चलाई पर फिर भी यूसुफ ने हार नहीं मानी। बंबई में बड़ाला नमक सत्याग्रह में हजारों की भीड़ पर पुलिस ने घोड़े दौड़ाए। यूसुफ ने एक घोड़े की लगाम पकड़ ली। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
1934 में जब कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन हुआ तो उसमें आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण, अशोक मेहता, अच्युत पटवर्धन, एस.एम. जोशी, एन.जी. गोरे, राम मनोहर लोहिया और यूसुफ मेहर अली की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
14 जनवरी, 1935 को यूसुफ ने चैपाटी पर एक जनसभा में कहा कि ब्रिटिश शासन द्वारा थोपा गया कोई भी विधान नकली होगा जिसे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जाएगा। यूसुफ मेहर अली ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के श्रम सचिव के रूप में आजादी की लड़ाई में श्रमिकों पर खासा ध्यान दिया। श्रमिक आंदोलनों का उन्होंने नेतृत्व किया।
सितम्बर, 1936 में आंध्र समाजवादी पार्टी के सम्मेलन के वे अध्यक्ष बनाए गए। बंगाल में 2 अक्टूबर, 1936 के सम्मेलन में उन्होंने साम्प्रदायिक समस्या पर गंभीर भाषण दिया। जून 1937 में मालाबार यात्रा के दौरान उनकी सभाओं पर रोक लगा दी गयी और कालीकट में गिरफ्तार कर 6 महीने की जेल की सजा दी गई।
कच्छ के शासक के अत्याचारों के खिलाफ उन्होंने आंदोलन चलाया। 1938 में वे लाहौर में हुए समाजवादी दल के अधिवेशन के अध्यक्ष बनाए गए। इसी वर्ष उन्होंने यूरोप और अमेरिका का दौरा किया। लंदन में उनका भव्य स्वागत हुआ। लौटकर उन्होंने बिहार के समाजवादियों के सम्मेलन की अध्यक्षता की।
1940 में गांधी जी के व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर नासिक की केन्द्रीय जेल में रखा गया। समाजवादी यूसुफ मेहर अली 1942 में बंबई नगरपालिका के महापौर पद के उम्मीदवार बने। सरदार पटेल ने उनकी जीत में पूरी ताकत लगा दी। उनके पक्ष में 65 और उनके खिलाफ लड़ रहे दो नेताओं को 26 और 9 वोट मिले।
विश्वयुद्ध के दौरान जनता की सुरक्षा के लिए उन्होंने एक स्वयंसेवी जत्था बनाया जिसका नेतृत्व अशोक मेहता को दिया गया। युसुफ मेहर अली ने कई किताबे भी लिखीं जिनमें- द प्राइस ऑफ लिबर्टी, ए ट्रिप टू पाकिस्तान समेत कई किताबें शामिल हैं।
मुम्बई के कांग्रेस महासमिति के अधिवेशन में भाग लेने जब महात्मा गांधी आए तो महापौर के नाते यूसुफ मेहर अली ने उनका स्वागत किया। इसी अधिवेशन में 8 अगस्त, 1942 को भारत छोड़ो का प्रस्ताव पारित हुआ था। 9 अगस्त, 1942 को सभी बड़े नेता जेल में थे।
जयप्रकाश नारायण और डा. लोहिया के अलावा अरुणा आसिफ अली, ऊषा मेहता आदि ने अगस्त क्रांति की आग ऐसी भड़काई कि ब्रिटिश साम्राज्य को भारत छोड़ना ही पड़ा । अगस्त क्रांति की भूमिगत आंदोलन की योजना के क्रियान्वयन में लगातार भागदौड़ के बाद गिरफ्तारी होने पर उनको इतनी यातनाएं दी गई कि वे हार्ट के मरीज बन गए।
उन्हें नजरबंदी के दौरान ही रिहा कर दिया गया। 1946-47 में 42 बाकी कैदियों को आजादी मिली। 31 मार्च 1949 को वे मुम्बई नगर निर्वाचन क्षेत्र से चुने जाने पर विधानसभा के सदस्य बने। 2 जुलाई 1950 को उन्होंने अपने साथियों से अंतिम विदाई ली।
मौत के समय उनकी उम्र सिर्फ 47 साल थी। उनके शव को कंधा देने वालों में मोरारजी देसाई के अलावा जे.पी, डा. लोहिया, अच्युत पटवर्धन, अशोक मेहता, एन.जी. गोरे समेत हजारों लोग थे। डा. राजेन्द्र प्रसाद, जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।


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