मुंबई हादसे की चश्मदीद बोली: मेरे सामने मर रहे थे लोग, मैं भी नहीं बचती
एक चश्मदीद ने बात करते हुए हादसे के खौफनाक मंजर को बयान किया है।
एलफिन्स्टन और परेल रेलवे स्टेशन को जोड़ने वाले पुल पर शुक्रवार की सुबह मची भगदड़ की घटना में 18 पुरुष और 4 महिलाओं सहित कुल 22 यात्रियों की मौत हो गई है और 36 से अधिक जख्मी हुए हैं।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दर्दनाक दुर्घटना में जान गंवाने वालों के प्रति शोक व्यक्त किया है।
इन सब के बीच नेक्सा न्यूज़ से एक चश्मदीद ने बात करते हुए हादसे के खौफनाक मंजर को बयान किया है। कुछ ऐसा था हादसे से पहले का मंजर...
मुंबई की एक निजी कंपनी में बतौर प्रोड्यूसर काम करने वाले स्नेहा चौरसिया हादसे के वक्त एलफिन्स्टन रेलवे स्टेशन पर ही थी।
- उन्होंने हादसे के खौफनाक मंजर को बयान करते हुए बताया," मैं हर दिन की तरह चेंबूर से कांदिवली अपने ऑफिस के लिए सुबह आठ बजे निकल जाती हूं। पर शुक्रवार को कुछ काम था तो साढ़े नौ बजे गए।"
- ट्रेन में बैठने के बाद के सफर को बताते हुए स्नेहा ने कहा, "बारिश का मौसम लगभग बन रहा था। सायन आते-आते तेज बरसात शुरू हो गई।
करीब 10.15 मिनट पर मैं परेल उतरी। मुझे एलफिन्स्टन से चर्चगेट के लिए दूसरी ट्रेन पकड़नी थी। बारिश तेज हो चुकी थी।
परेल से एलफिन्स्टन रेलवे स्टेशन पर बने फुट ओवर ब्रिज पर मैं चढ़ी। वहां पहले से ही काफी भीड़ थी। बारिश से बचने के लिए ज्यादातर लोग वहीं इकट्ठा हो गए थे।"
-आगे स्नेहा ने बताया, "सब बारिश के रुकने का इंतजार कर रहे थे। उस वक्त इतनी भीड़ थी कि हाथ भी नहीं हिला सकते थे।
इसी दौरान कई लोगों के मोबाइल भीड़ में गिर गए। लोग एक-दूसरे के पैर पर चढ़ रहे थे। मेरा भी पैर कई बार दबा जैसे-तैसे बड़ी मुश्किल से वहां से निकली।"
मैंने लोगों को गिरते हुए देखा
- आगे स्नेहा ने बताया, "लोग एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लड़ाई भी कर रहे थे। जैसे-तैसे मैं निकल पाई। एक मिनट भी नहीं हुआ होगा और जोरदार चिखने-चिल्लाने की आवाज सुनाई देने लगी।
मैं तब तक दूसरे प्लेटफॉर्म पर थी जहां से मैं सब देख सकती थी। जिस ब्रिज पर मैं कुछ मिनट पहले थी वहां का नजारा अब बदल गया था। मैंने लोगों को एक के बाद नीचे गिरता देखा।
-आगे स्नेहा ने बताया, नीचे दबे लोगों की परवाह किए बिना हर कोई अपनी जान बचाने के लिए उन्हें कुचलता हुआ आगे बढ़ रहा था।
इस दौरान जान बचाने के लिए लोग रेलिंग पर लटके और कई वहां से गिर रहे थे। भयानक मंजर था ब्रिज पर नीचे दबे लोगों में से किसी का सिर बाहर लटक रहा था। तो किसी का सिर्फ हाथ हिलते हुए दिख रहा था।
- अपनी बेबसी बयान करते हुए स्नेहा ने बताया, "यह अंदर दबे होने और सांस न ले पाने की छटपटाहट थी जिसे मैं बस देख सकती थी और चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी।
मैं स्तब्ध रह गई और बस रोए जा रही थी। जिंदगी में पहली बार कोई हादसा आंखों के सामने देखा। वो भी वहां जहां ठीक चंद मिनट पहले मैं खुद थी।
खून से लथपथ लोग खोज रहे थे अपना सामान
- स्नेहा ने बताया, "मैंने एक महिला को देखा था। जब मैं उस ब्रिज से गुजर रही थी वो काफी पीछे थी। लेकिन बाद में वो नजर नहीं आई।
जो महिलाएं वहां से बच भी गई थी वो खून से लथपथ थी। अपना बैग, मोबाइल तलाश रही थी। लेकिन उस वक्त वहां मोबाइल का नेटवर्क भी नहीं मिल रहा था।"
सरकार पर उठाया सवाल
- स्नेहा ने सरकार पर सवालिया निशान लगाते हुए पूछा, "मैं पूछना चाहती हूं सरकार से। क्या हमारे देश के लोगों को वाकई बुलेट ट्रेन की जरूरत है या फिर सालों पुरानी जर्जर हो चुकी व्यवस्था पहले सुधर जाए उसकी ज्यादा।
आज मैं बच गई किस्मत थी। चंद मिनटों ने बचा लिया, लेकिन उनका क्या दोष था जो सरकार की नजरअंदाजी के चलते आज बेमौत मारे गए।
उस ब्रिज से अक्सर निकलते वक्त यह लगता था कि कभी यहां कुछ हो गया तो क्या होगा। आज वो सही साबित हो गया।"


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