कई गोल्ड मेडल जीत चुका ये प्लेयर करता है स्वीपर का काम,शाम को देता है बॉक्सिंग की ट्रेनिंग
हमारे देश में क्रिकेट को छोड़कर अन्य खेलों की तरफ सरकारें ज्यादा ध्यान नहीं देती हैं जिस वजह से कई खिलाड़ी आज मजबूरन गरीबी में जी रहे हैं। ऐसे ही एक खिलाड़ी हैं बच्चेलाल जो बॉक्सिंग में कई गोल्ड मेडल और ट्रॉफी जीत चुके हैं। लेकिन अफसोस वो आज स्वीपर का काम करने को मजबूर हैं।
गरीबी ने खेल में उन्हें आगे बढ़ने का ज्यादा मौका नहीं दिया। न ही कभी सरकार से उन्हें कोई मदद मिली। बॉक्सिंग से दूरी कभी खत्म न हो, इसके लिए उन्होंने खेलसंघों से लेकर कई उच्चाधिकारियों तक मदद की गुहार लगाई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। हारकर उन्होंने केजीएमयू में स्वीपर की नौकरी कर ली।
बच्चेलाल का जन्म उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनउ के क्वीन मेरी हॉस्पिटल के सर्वेंट क्वार्टर में 15 जनवरी 1972 में हुआ था। पिता मुन्नालाल केजीएमयू के नर्सिंग हॉस्टल में सफाई कर्मचारी थे। उस टाइम उन्हें 500 रुपए सैलरी मिलती थी।
घर में पांच भाई और एक बहन थे। उनमें ये तीसरे नंबर पर थे। पिता के लिए घर का खर्च चलाना काफी मुश्किल था। उन्होंने नगर निगम स्कूल से पांचवी तक की पढ़ाई पूरी की। उसके बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी।
बच्चेलाल के मुताबिक, उन्हें बचपन से ही मुक्केबाजी का शौक था। वो क्वीन मेरी हॉस्पिटल के सर्वेंट क्वॉटर में खोला करते थे। वहीं पर एक रिटायर्ड कर्नल आते थे। उनको भी मुक्केबाजी पसंद थी। एक दिन उनकी नजर बच्चेलाल पर पड़ी।
उस टाइम वो मुक्केबाजी कर रहे थे। ये देख उन्होंने बुलाया और मुक्केबाजी सिखाने के लिए कहा। कुछ महीने तक उन्होंने बॉक्सिंग उनके पास सीखी। उसके बाद से ये शौक बढ़ता ही चला गया।
बच्चेलाल ने बताया, एक दिन केडी स्टेडियम में बॉक्सिंग प्रतियोगिता देखने के लिए गया था। वहीं मेरी मुलाकात कोच नसीम कुरैशी से हुई। उन्होंने उनसे बॉक्सिंग सिखाने की रिक्वेस्ट की।
तब उन्होंने मेरा स्टेडियम में एडमिशन कराने के लिए बोला। मैंने फीस देने में असमर्थता जताई। इस पर उन्होंने मेरा टेस्ट लिया। उस टेस्ट मैं फर्स्ट आया। इसके बाद मेरी फीस माफ कर दी गई।
बॉक्सिंग सीखने के बाद उन्होंने डिस्ट्रिक्ट और स्टेट लेवेल की कई प्रतियोगिताएं जीतीं, लेकिन पैसों की कमी की वजह से नेशनल लेवेल तक नहीं पहुंच पाए।
सरकारी मदद के लिए कई बार अधिकारियों से गुहार भी लगाई, लेकिन कभी कोई सरकारी मदद नहीं मिली। परिवार का खर्चा चलाने की मजबूरी थी। इसलिए बॉक्सर का काम छोड़कर स्वीपर का काम शुरू कर दिया।
बच्चेलाल पहले केजीएमयू से काम करके दिन में एक बार चौक स्टेडियम जरूर जाते थे। वहां वो युवाओं को बॉक्सिंग की ट्रेनिंग देते थे। खास बात ये है कि इसके लिए वो फीस भी नहीं लेते थे।
उनके सिखाए हुए बच्चे अब तक कई मेडल जीत चुके हैं, लेकिन उनके खुद का नेशनल लेवल का बॉक्सर बनने का सपना गरीबी के चलते पूरा नहीं हो सका।
आलम ये हो चला है कि दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से नसीब होती है, लेकिन इन तमाम हालातों के बाद भी बॉक्सिंग के लिए उनका प्यार खत्म नहीं हुआ है।
पिता की डेथ होने के बाद से क्वीन मेरी से मिला सरकारी सर्वेंट क्वाटर छीन लिया गया। मैं केजीएमयू में काम करने के दौरान एक झोपड़ी में रहता था।
एक दिन केजीएमयू की एक्स वीसी प्रो. चूड़ामणि की नजर मुझ पर पड़ी। उन्होंने आवास विकास के अधिकारियों से फोन पर बात करके सीतापुर में एक मकान दिलवा दिया। तब मैं वहीं पर अपने परिवार के साथ रह रहा हूं।
बच्चेलाल की चार बेटियां है। बेटी इंदु 18 साल की हैं। वो इंटरमीडियट की पढ़ाई कर रही हैं। दूसरे नंबर पर सिमरन 16 साल की हैं। वह 11 वीं में हैं।
शिवानी की उम्र 12 साल है। वह 8वीं में पढ़ाई कर रही है। दीपिका की उम्र 10 क्लास में पढ़ाई कर रही हैं। जबकि वाईफ सुनीता वाल्मीकि हाउसवाइफ है।
वह लोगों को घरों में घरेलू काम करके परिवार का खर्च चलाने में अपने हसबैंड की मदद कर रही हैं। बच्चेलाल अपनी बेटियों को हायर स्टडीज की पढ़ाई पूरी कराना चाहते हैं।
उनका सपना है कि बच्चे पढ़-लिखकर अपने पैर पर खड़े हो जाएं। इसके लिए बच्चेलाल कई बार ओवर टाइम भी काम करते हैं। उसके लिए परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है।


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