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1 लाख से ज्यादा डिलिवरी कराने वाली डॉक्टर भक्ति यादव नहीं रहीं, मोदी ने जताया दुख


एक लाख से ज्यादा डिलेवरी करवाने वालीं डॉक्टर भक्ति यादव नहीं रहीं। वे 91 साल की थीं और आखिरी वक्त तक मरीजों की सेवा करती रहीं। भक्ति पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रही थीं। सोमवार को इंदौर में अपने घर पर उन्होंने आखिरी सांस ली। सरकार ने इसी साल उन्हें पद्मश्री से नवाजा था। उन्हें डॉक्टर दादी के नाम से भी जाना जाता था। नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। पीएम ने लिखा- ''भक्ति यादव का दुनिया से चले जाना दुखद है। मेरी संवेदनाएं उनके परिवार के साथ हैं। उनका काम हम सबके लिए एक प्रेरणा है।'

डॉक्टर भक्ति का जन्म उज्जैन के महिदपुर में 3 अप्रैल, 1926 को हुआ था। शुरुआती पढ़ाई महिदपुर में ही हुई, आगे पढ़ाई के लिए गरोठ और इंदौर चली गईं। वे महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज (MGM) में पहले एमबीबीएस बैच की स्टूडेंट थीं।

- 1952 में एमबीबीएस की डिग्री हासिल कर मध्य प्रदेश की पहली महिला डॉक्टर बनीं। उस दौर में भंडारी कपड़ा मिल ने नंदलाल भंडारी प्रसुतिगृह के नाम से महिलाओं के लिए एक हॉस्पिटल खोला था। भक्ति यहां बतौर गायनेकोलॉजिस्ट काम करने लगीं।

- 1978 में इस हॉस्पिटल के बंद होने के बाद उन्होंने अपने घर को ही नर्सिंग होम बना दिया। बहुत कम फीस पर मरीजों का इलाज शुरू करती थीं। पिछले 20 सालों से वे बिना किसी फीस के इलाज कर रही थीं

उस दौर में आज की तरह संसाधन और बिजली नहीं थी। कई बार ऐसे हालात बने कि उन्हें बिजली के बगैर डिलेवरी करवानी पड़ी। ऐसे में मोमबत्ती और लालटेन का सहारा लेना पड़ता था।
- भक्ति ने 64 साल के करियर में एक लाख से ज्यादा डिलेवरी करवाईं। सरकार ने इस उपलब्धि के लिए उन्हें जनवरी में पद्मश्री से नवाजा था। उनकी आखिरी इच्छा सांस छूटने तक काम करने की थी। इसीलिए बीमार रहने के बाद भी मरीजों को देखती थीं।


- पद्म अवॉर्ड मिलने के बाद भक्ति यादव ने भास्कर से बातचीत की थी। उन्होंने कहा- ''बचपन से एक ही सपना था डॉक्टर बनूं। उस दौर में लड़कियों को पढ़ाई भी नहीं करने दी जाती थी, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। १९४८, से 1951 के बैच में मैं अकेली लड़की थी, जिसने मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लिया। डॉक्टर बनी। 68 साल तक हजारों लोगों का इलाज किया, खूब दुआएं मिलीं। चाहती हूं कि मरते दम तक लोगों का मुफ्त इलाज करूं। अवॉर्ड मिलने की खुशी है, लेकिन यह खुशी तब और बढ़ जाएगी जब पहले की तरह मरीज डॉक्टर पर भगवान जैसा भरोसा करने लगे। इसके लिए डॉक्टरों को इलाज के वक्त मरीज से ऐसा रिश्ता बनाना होगा।''