किसान परिवार से थे देश के 7वें राष्ट्रपति
व्यक्तित्व की बदौलत ज्ञानी जैल सिंह बने थे सर्वोच्च नागरिक, साधारण परिवार से राष्ट्रपति भवन तक का सफर
17 जुलाई को राष्ट्रपति चुनाव होना है। इस मौके पर हम आपको देश के 7वें राष्ट्रपति और पंजाब से ताल्लुक रखने वाले ज्ञानी जैल सिंह की लाइफ से जुड़ी कुछ बातें शेयर कर रहे हैं। फरीदकोट रियासत के गांव संधवां में 5 मई 1916 को एक साधारण किसान परिवार में पैदा हुए ज्ञानी जैल सिंह ने अपने व्यक्तित्व की बदौलत भारत का सर्वोच्च नागरिक होने का मान हासिल किया था। 9 माह की उम्र में मां नहीं रही तो बहन ने पाला...
ज्ञानी जैल सिंह का पूरा परिवार सादगी से जीवन व्यतीत करता रहा है। राज्य सरकार में मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक और केंद्र सरकार में भी मंत्री से लेकर राष्ट्रपति पद मिलने के बावजूद परिवार में कभी अभिमान नहीं आया और आज भी उनके 81 वर्षीय बेटे जोगिंदर सिंह गांव संधवां में सादगी भरा जीवन जी रहे हैं।
भाई किशन सिंह की चार संतानों में से सबसे छोटे ज्ञानी जैल सिंह की भी पिता की तरह धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा थी।
जब ज्ञानी महज 9 माह के थे तभी मां इंद्री कौर का निधन हो गया। इसके बाद मां की बड़ी बहन दया कौर ने उनका लालन पोषण किया।
आजादी संग्राम के दौरान 15 वर्ष की उम्र में वह स्वतंत्रता सेनानी बन गए।
1933 में अंग्रेजों के खिलाफ मार्च में भाग लेने पर उन्हें पहली बार जेल जाना पड़ा। उस समय उन्हें लाहौर की केंद्रीय जेल में बंद किया गया था।
- 1938 में राष्ट्रीय स्तर पर पंडित जवाहर लाल नेहरू की अगुवाई में चल रहे स्वतंत्रता संग्राम से प्रभावित होकर उन्होंने फरीदकोट में कांग्रेस समिति का गठन किया और खुद रियासती प्रजा मंडल आंदोलन में शामिल हुए।
- इस आंदोलन को दबाने के लिए किए गए जुल्मों के आगे ज्ञानी जी नहीं झुके। जिसके चलते उन्हें पांच वर्ष की सजा सुनाई गई।
जब नेहरू फरीदकोट आए थे
- 1946 में अंग्रेजी हकुमत के खिलाफ सत्याग्रह शुरू किया और यहां के हालातों के चलते 27 मई 1946 को पंडित जवाहर लाल नेहरू फरीदकोट आए।
- उस समय पंडित नेहरू ने ज्ञानीजी की अगुवाई में पुरानी दाना मंडी में तिरंगा फहरा कर स्वतंत्रता संग्राम को और तेज करने का एलान किया था।
हादसे ने ली जान...
1979 में सांसद बनने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार में उन्हें केंद्रीय गृह मंत्री बनाया गया।
इसके बाद वह 25 जुलाई 1982 को भारत के 7वें राष्ट्रपति बने। 29 नवंबर 1994 को आनंदपुर साहिब से चंडीगढ़ लौटते समय वह हादसे का शिकार हुए और 25 दिसंबर 1994 को ई पीजीआई चंडीगढ़ में उनका निधन हो गया।


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