देवदास के 100 साल: शाहरुख खान ने बताया कि क्या खास है इस किरदार में
30 जून 1917 को शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास देवदास पब्लिश्ड हुआ था। शरतचंद्र नहीं चाहते थे कि इसे छापा जाए। उन्होंने एक फ्रेंड को लेटर लिखा था कि "देवदास छपने के लिए मत देना। इस बारे में सोचना भी मत। यह अनैतिक है। इसमें एक वैश्या है और भी न जाने क्या-क्या है'। फिर भी इसे छापा गया। इस पर अब तक करीब 16 फिल्में बनी हैं। देवदास का किरदार निभा चुके शाहरुख खान बता रहे हैं क्या है इस किरदार में खास जो हर दौर में यह अट्रैक्ट करता रहा है। मैं कोई भी देवदास नहीं देखूंगा...
- "मैंने दिलीप साहब की देवदास जब देखी थी, तब मैं बहुत छोटा था। जब संजय (लीला भंसाली) ने मुझे कहानी सुनाई तब तक मैं तकरीबन-तकरीबन इसे भूल चुका था। एक-दो हल्के-हल्के सीन याद थे। वह इस जमाने की नहीं बहुत पहले की खूबसूरत फिल्म थी। जब हमने फिल्म शुरू की तो मैंने खासकर तय किया था कि मैं कोई भी देवदास नहीं देखूंगा। और मैंने नहीं देखी।"
- "हकीकत तो यह है कि जब शूटिंग खत्म कर ली उसके बाद हम दिलीप साहब की ब्लेसिंग लेने गए तो उसी दिन डिंपल थिएटर में हमने उनकी देवदास देखी थी। मतलब, अपनी फिल्म की शूटिंग खत्म करने के बाद देखी। किताब मैंने पूरी पढ़ी थी।"
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"मेरा मानना है कि मेरी वाली देवदास और बाकी की भी, किताब के किरदारों के लगभग नजदीक ही हैं। बस हमारी वाली में थोड़ा ड्रामा ज्यादा था।"
- पहले की किसी भी देवदास में मुझे नहीं लगता कि चंद्रमुखी और पारो आपस में मिली होंगी। बाकी की कहानी लगभग एक समान है।"
देवदास को शायद कमिटमेंट फोबिया था
- शाहरुख ने बताया, "जो खास बातें देवदास किरदार की मुझे लगी वो उसका अल्कोहलिक होना नहीं था। ज्यादातर लोग उन्हें अल्कोहलिक के रूप में ही बताते हैं, लेकिन किताब पढ़ने के बाद मुझे ऐसा लगा कि शायद देवदास बहुत सारे मर्दों की तरह कमिटमेंट फोबिक (वादा करने से डरने वाले) हैं। अल्कोहलिक या कुछ और नहीं।
- "वे बहुत प्यार करने वाले थे। बहुत ही सेंसेटिव। परिवार में पिता के साथ उन्हें दिक्कत थी। जैसे कई लोग होते हैं न जिनके बारे में हम सुनते हैं कि लड़की कहती है - मैं इतने सालों से इसे जानती हूं, लेकिन यह शादी करने से कतरा रहा है।"
- "मुझे लगता है, देवदास को कमिटमेंट फोबिया भी उनकी पारिवारिक हालात की वजह से ही रहा होगा। वह कमिटमेंट फोबिक है, मुझे लगता है कि यही खास बात है उस किताब के 100 साल होने के बावजूद आज भी वह रिलेवेंट है।"
हर पीढ़ी अपने नजरिए से देख सकती है
- शाहरुख ने कहा, "हर पीढ़ी उस किताब को पढ़कर अपने नजरिए से कहानी को सामने लाना चाहती है। आप देवदास को एक सोशलिस्ट की तरह भी देख सकते हैं। आप आजादी के पहले का दौर भी इसमें देख सकते हैं।"
- "आप उसे पिता-पुत्र की कहानी की तरह भी समझ सकते हैं। आप एक अल्कोहलिक इंसान की कहानी के तौर पर भी उससे जुड़ सकते हैं।"
इसका मॉडर्न वर्जन देव-डी भी बना। मेरे हिसाब से तो यह किताब अब मोनालिसा की मुस्कान की तरह है। आप अपने नजरिए से उसे दिखा सकते हैं। यह सिर्फ दुःख या खुशी की ही कहानी नहीं है। शायद इसी कारण इस पर कई फिल्में बनी हैं।"
देवदास में ओवर सेंसिटिविटी है
- खान ने कहा, "देवदास में ओवर सेंसिटिविटी है। जैसे पारो आकर उसको बोलती है कि शराब पीना छोड़ दो, तो देवदास कहता है कि तुम अपने पति को छोड़ दो। वह कहती है- ऐसा नहीं हो सकता, मैं अपने पति को नहीं छोड़ सकती। तब देवदास कहता है कि फिर मुझे मत बताओ, अभी मेरे साथ भाग चलो।"
- "वह जानता है कि वो नहीं भागेगी, लेकिन ये उसका दिलजलापन है, हर्ट करने के लिए। मैं हमेशा मानता हूं आप उसी लड़की को सबसे ज्यादा दुख पहुंचाआेगे, जिसे आप सबसे ज्यादा प्यार करते हो। ये बात लड़कियों पर भी लागू होती है। यह बात मुझसे काफी हद तक जुड़ी है।"
कौन कमबख्त बर्दाश्त करने के लिए पीता है
- बकौल शाहरुख, "सच कहूं तो मैंने एक ही फिल्म डायलॉग पर साइन की है, वह देवदास ही है। शूटिंग के दौरान मैंने कहा कि वह डायलॉग- ‘कौन कमबख्त बर्दाश्त करने के लिए पीता है’, उसे मैं एक ही शॉट में करना चाहता हूं। तो संजय ने दो- तीन कैमरा लगाए, लेकिन कुछ मोमबत्तियां बुझ गईं। तब वे बोले कि शॉट बहुत खूबसूरत हुआ, लेकिन क्या इसे एक बार और कर सकते हैं, क्योंकि मोमबत्तियां बुझ गई थीं।
- "हम सबसे ज्यादा मेहनत संजय ने की थी। मुझे इसका एक डायलॉग जो सबसे ज्यादा पसंद है वह यह है कि- अपने हिस्से की जिंदगी हम जी चुके चुन्नी बाबू अब तो सांसों का हिसाब...। दूसरा एक डायलॉग है, जब पारो देवदास के साथ नहीं भागती, तब मैं उसे दुष्ट कहता हूं।"


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