इस एमबीबीएस डॉक्टर की फीस है महज 1 रुपया, 32 साल से कर रहे इलाज
महाराष्ट्र के डॉक्टर दंपती स्मिता कोल्हे और रविंद्र कोल्हे 32 साल से डॉक्टरी पेशे में हैं। एमबीबीएस पढ़ाई के आखिरी दिनों में ठाना कि समाज के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचकर इलाज करना है। ढाई महीने तक भटकने के बाद अमरावती जिले के बैरागड गांव पहुंचे। तब से वहीं मरीजों का इलाज कर रहे हैं। ये ऐसा गांव है, जहां पहुंचने के लिए मुख्य जिले से 25 किलोमीटर बस, फिर 30 किलोमीटर पैदल चलकर जाना पड़ता था। स्मिता और रविंद्र यहां एक रुपए में मरीजों का इलाज करते हैं। रविंद्र को सामाजिक कार्यों के लिए 2011 में 10 लाख रुपए का पुरस्कार भी मिला था। इसे भी गांव में ऑपरेशन थिएटर बनाने में लगा दिया। स्मिता और रविंद्र अब एक कदम आगे बढ़ते हुए खेती-किसानी पर भी ध्यान दे रहे हैं। उनका कहना है- जब गांव के लोग अच्छा और पेट भर खाएंगे, तो बीमारियों का खतरा रहेगा ही नहीं।
डॉक्टर रविंद्र ने कहा, ''एमबीबीएस के आखिरी दिनों में मैंने जॉन रस्किन की ‘अन टू दिस लास्ट’ किताब पढ़ी। इसमें रस्किन ने समाज के आखिरी आदमी तक पहुंचने की बात कही है। डॉक्टर होने के नाते मैंने अपना आखिरी मरीज ढूंढने की ठानी। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में ढाई महीने तक घूमता रहा। 1985 में मेरी तलाश बैरागड जाकर खत्म हुई। ये गांव मुख्य धारा से दूर था।
हमने यहीं काम करने का फैसला लिया। पहली चुनौती तो यहां के लोगों को चिकित्सा में भरोसा दिलाने की थी। किसी भी इलाज के लिए लोग जादू-टोने में ही भरोसा करते थे। हमें तो वो धर्मांतरण कराने वाला समझते थे। वो कहते थे, ‘हम तो बीमार होने पर जानवर की बलि देते हैं। इसमें 100 रुपए तक लग जाते हैं। आप 10 पैसे में ऐसी कौन-सी चीज (दवा) दे रहे हैं जिससे बीमारी ठीक हो जाएगी।’ हम पर तीन बार बड़े हमले भी हुए। फतवा भी जारी हुआ। फिर धीरे-धीरे हमने लोगों का भरोसा जीता।
अच्छा पैसा मिलेगा, तभी युवा डॉक्टर गांव में काम करने जाएंगे
डॉक्टर रविंद्र कहते हैं- ‘आज के युवा डॉक्टर गांव जाकर काम करने से कतराते हैं। इसका कारण है कि गांव में काम करना उनके लिए आर्थिक तौर पर कम फायदेमंद होता है। इस बात को नकार नहीं सकते। शहर में डॉक्टर-इंजीनियर को जैसा पैकेज मिलता है, वैसा ही उन्हें गांव जाकर काम करने पर भी मिलना चाहिए। आने वाली पीढ़ी के डॉक्टरों को गांव में काम करने के लिए इसी तरह से प्रेरित कर सकते हैं।’
आज 32 साल बाद गांव की हालत काफी सुधरी है। कभी एक महीने में 400 लोग इलाज के लिए आते थे। अब ये संख्या ३०,40 तक आ गई है। अब हम गांव में एग्रीकल्चर पर ध्यान दे रहे हैं। हमारा बेटा राम नई टेक्नोलॉजी से खेती करा रहा है। कुछ और भी युवक साथ जुड़े हैं। हम चाहते हैं कि लोग अच्छा और भरपेट खाएं, फिर बीमारियों का खतरा ही नहीं रहेगा।

Post a Comment