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बिल्ला के नाम से फेमस था यह विलेन, क्या इस वजह से हुई थी उनकी मौत


माणिक अब हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन उनकी मौत कैसे हुई? इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है।

80 और 90 के दशक की फिल्मों में कई ऐसे विलेन भी नजर आए हैं, जिन्होंने छोटे-छोटे रोल करने के बावजूद अपनी पहचान दर्शकों के जेहन में छोड़ी है।

 इन्हीं में से एक हैं माणिक ईरानी, जिन्हें लोग बिल्ला के नाम से भी जानते हैं। माणिक अब हमारे बीच नहीं हैं।

 लेकिन उनकी मौत कैसे हुई? इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है।

कुछ रिपोर्ट्स में कहा जा चुका है कि 90 के दशक में ज्यादा शराब पीने की वजह से माणिक की मौत हुई तो कुछ इसे एक्सीडेंट बताती हैं।

वहीं, कुछ अन्य रिपोर्ट्स में ऐसा दावा भी किया जा चुका है कि उन्होंने सुसाइड किया था। ऐसे पड़ा था 'बिल्ला' नाम...

- माणिक फ़िल्मी दुनिया का जाना-पहचाना चेहरा तो थे, लेकिन वे असली नाम की बजाय 'बिल्ला' नाम से पॉपुलर हुए।

- दरअसल, माणिक ने डायरेक्टर सुभाष घई की फिल्म 'हीरो' में बिल्ला नाम का किरदार निभाया था, जिसे लोगों ने इतना पसंद किया कि माणिक की पहचान ही बन गया।

- 1983 में रिलीज हुई इस फिल्म में जैकी श्रॉफ, मीनाक्षी शेषाद्री, शम्मी कपूर, संजीव कुमार, शक्ति कपूर और मदन पुरी का भी अहम रोल था।

1978 में डायरेक्टर चंद्रा बारोट की फिल्म 'डॉन' रिलीज हुई थी।

अमिताभ बच्चन, प्राण, जीनत अमान, इफ्तेखार, कमल कपूर और जगदीश राज जैसे एक्टर्स ने इसमें कम किया था, जिन्हें क्रेडिट भी दिया गया था।

- लेकिन कहा जाता है कि माणिक ईरानी इस फिल्म के एक्शन सीन्स के लिए अमिताभ के बॉडी डबल थे। हालांकि, उन्हें क्रेडिट नहीं दिया गया था।]

माणिक ईरानी को कई 'पाप और पुन्य' (1974), 'त्रिशूल' (1978), 'जॉनी आई लव यू' (1982), 'नास्तिक' (1983), 'करमा' (1986), 'जख्म' (1989) और 'शानदार' (1990) जैसी कई फिल्मों में भाड़े के गुंडे के किरदार में देखा गया था।

- माणिक ने 1976 में फिल्म 'कालीचरण' में मदन पूरी के बेटे का रोल किया था।

 इसके अलावा, 'शान' (1980) में वे शाकाल (कुलभूषण खरबंदा) के असिस्टेंट के रोल में दिखाई दिए थे। ऐसे कई अन्य किरदार हैं, जिन्हें दर्शकों ने उन्हें निभाते हुए पर्दे पर देखा।

माणिक को उनके किरदार ही डायलॉग डिलीवरी के लिए भी जाना जाता था। फिल्मों में उन्होंने कई फेमस डायलॉग्स भी बोले। डालते हैं चुनिंदा डायलॉग्स पर एक नजर...

- 'आशिक की जगह जमीन पे नहीं...ऊपर होती है' (हीरो)

- मैं इस हरामजाड़े की वो हालत बनाऊंगा कि वैद और हकीम भी परेशान हो जाएंगे और सोचेंगे कि थोबड़ा कौन-सा है और हाथ पैर कौन-से हैं? (पाप को जलाकर राख कर दूंगा)