पच्चीस साल में 79 हजार किलोमीटर चले गांधीजी
आज यदि हम महात्मा गांधी के आदर्शों पर सच्चे अर्थों में चलने की सोचें तो रूह कांप उठती है। इसके लिए असाधारण संकल्प शक्ति चाहिए। सत्य के मार्ग पर चलने की बात हो या अल्पवस्त्र पहनने की बात, एक बार तय किया तो गांधीजी पूरे जीवन उस पर अडिग रहे। आइए, गांधी जयंती पर जानें उनकी संकल्प व प्रेरक शक्ति की बातें :
महात्मा गांधी मानते थे कि पैदल चलना व्यायाम का राजा है, इसलिए वे बहुत लंबी दूरी के लिए भी किसी साधन की बजाय पैदल चलने को तरजीह देते थे। पढ़ाई के लिए इंग्लैंड और वकील के रूप में दक्षिण अफ्रीका में रहते समय वे पैसे बचाने के लिए पैदल चला करते थे। इसका जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा में भी किया है। वे अपने पूरे जीवन में औसतन रोज 18 किलोमीटर पैदल चले। इतनी पैदल यात्रा में तो वे दो बार धरती का चक्कर लगा सकते थे! १९१३,से 1938 तक विभिन्न आंदोलनों के दौरान 25 वर्षों में वे करीब 79,000 किलोमीटर पैदल चले। उन्होंने खुद एक जगह लिखा है कि दक्षिण अफ्रीका में टॉलस्टाय आश्रम की स्थापना के समय वे एक ही दिन में 51 मील (82.07 किलोमीटर) चले थे। दांडी यात्रा के दौरान वे करीब 390 किलोमीटर चले थे। इस नमक सत्याग्रह के दौरान गांधीजी ने 24 दिनों तक रोज औसतन १६, से 19 किलोमीटर पैदल यात्रा की। दांडी यात्रा से पहले बिहार के चंपारन में सत्याग्रह के दौरान भी गांधीजी बहुत पैदल चले थे। किसानों को गैर-लाभप्रद नील की खेती करने पर मजबूर करने के खिलाफ हुए इस आंदोलन का यह शताब्दी वर्ष है। इसके दो साल पहले 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद भारत को जानने के लिए की गई देशभर की यात्रा के दौरान भी गांधीजी ने गांवों में काफी पैदल यात्रा की थी।
देश के लिए चालीस साल के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गांधीजी ने करीब 1 करोड़ शब्द लिखे यानी रोज करीब 700 शब्द। उन्होंने मूल रूप से सात किताबें लिखीं और भगवद गीता का गुजराती में अनुवाद किया। उनकी शुरुआती तीन किताबें उनके आंदोलन, मानव जीवन और आर्थिक विचार को स्पष्ट करती हैं। ‘आत्मकथा : सत्य के साथ मेरे प्रयोगों की कहानी’ में बचपन से लेकर 1921 तक की घटनाओं का वर्णन है। यह उनके साप्ताहिक ‘नवजीवन’ में १९२५, से 1929 तक शृंखला के रूप में प्रकाशित हुई। उनकी दूसरी किताब थी ‘हिंद स्वराज।’ इसमें उन्होंने स्वदेशी आधारित स्वराज व आत्मनिर्भरता का विचार दिया। यह उन्होंने लंदन से दक्षिण अफ्रीका जाते हुए १३, से 22 नवंबर 1909 में लिखी। महात्मा गांधी ने पुणे के आगा खां पैलेस जेल में रहते 28 अगस्त से 18 दिसंबर 1942 के बीच ‘आरोग्य की कुंजी’ लिखी थी। किताब में गांधीजी किसी डॉक्टर की भांति नुस्खे बताते नज़र आए हैं। वे मानव-शरीर के अनोखे-भेद कुशल डॉक्टर की भांति बताते चले जाते हैं। वे हवा, पानी, शारीरिक-खुराक, मसाले, चाय, मादक-पदार्थ, अफीम, ब्रह्मचर्य, पृथ्वी, आकाश, तेज, चाय, कॉफी, कोको, ताड़ी तक की अच्छी जानकारी देते हैं। उनके लेखन में राजनीतिक और बाल विवाह प्रथा पर रोक, शराबबंदी,अस्पृश्यता, स्वच्छता और राष्ट्र निर्माण जैसे विषय प्रमुख रहे।
भारतीय करेंसी नोटों पर हमें गांधीजी का मुस्कुराता हुआ फोटो नज़र आता है। यह फोटो लोगों में बहुत लोकप्रिय है। कई लोगों को लगता है कि यह हाथ से बनाया गया रेखा-चित्र है। लेकिन, सच तो यह है कि किसी अज्ञात फोटोग्राफर ने 1946 में यह फोटो खींचा था। तब गांंधीजी भारत और बर्मा (म्यांमार) के ब्रिटिश सेक्रेटरी फ्रेडेरिक पेथिक लॉरेंस के साथ दिल्ली के वाइसराय हाउस में मुलाकात कर रहे थेे, जो अब राष्ट्रपति भवन कहलाता है।
महात्मा गांधी कभी अमेरिका नहीं गए पर वहां उनके बहुत से प्रशंसक व अनुयायी थे। इनमें से एक थे प्रसिद्ध उद्योगपति हेनरी फोर्ड। 25 जुलाई 1941 को इस अमेरिकी ऑटोमेकर ने डियरबोर्न (मिशिगन) से गांधीजी को पत्र लिखा और भारत से ब्रिटिश शासन को खत्म करने के लिए उनके अहिंसक-असहयोग आंदोलन की प्रशंसा की। उन्होंने लिखा, ‘मैं इस मौके पर आपसे कहना चाहता हूं कि मैं आपके जीवन और संदेश का बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। आप उन महानतम लोगों में से हैं, जिसे इस दुनिया ने जाना है।’ उस वक्त नाज़ी जर्मनी ने पोलैंड पर हमला कर दिया था। बदले में ब्रिटेन और फ्रांस ने उसके खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था। राष्ट्रपति फ्रेंकलिन रुजवेल्ट के नेतृत्व में अमेरिका उनके साथ था। फोर्ड चाहते थे कि अमेरिका तटस्थ बना रहे पर सरकार उनकी कंपनी पर दबाव डाल रही थी कि वह विमानों का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करे ताकि नाज़ी जर्मनी को हराया जा सके। दवाब के आगे झुकते हुए उन्होंने गांधीजी को पत्र लिखने के एक माह पहले ही विमानों का उत्पादन शुरू किया था। खैर, लंदन स्थित यूनाइटेड प्रेस ऑफ इंडिया के संपादक टीए रामन के हाथों यह पत्र गांधीजी को भिजवाया गया जो उन्हें 8 दिसंबर 1941 को मिला। पर्ल हार्बर पर जापान के हमले के एक दिन बाद। उपहार में गांधीजी ने फोर्ड को चरखा भिजवाया। रामन ने खुद ग्रीनफील्ड विलैज, मिशिगन में फोर्ड को यह चरखा सौंपा। फोर्ड चरखे की यांत्रिक सादगी से चमत्कृत रह गए। उन्होंने चरखे को सादगी के सिद्धांत और आर्थिक निर्भरता के प्रतीक के रूप में संभालकर रखा। वे प्राय: गहरी निराशा के पलों में चरखा चलाया करते थे।
देश के लिए चालीस साल के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गांधीजी ने करीब 1 करोड़ शब्द लिखे यानी रोज करीब 700 शब्द। उन्होंने मूल रूप से सात किताबें लिखीं और भगवद गीता का गुजराती में अनुवाद किया। उनकी शुरुआती तीन किताबें उनके आंदोलन, मानव जीवन और आर्थिक विचार को स्पष्ट करती हैं। ‘आत्मकथा : सत्य के साथ मेरे प्रयोगों की कहानी’ में बचपन से लेकर 1921 तक की घटनाओं का वर्णन है। यह उनके साप्ताहिक ‘नवजीवन’ में १९२५, ,से 1929 तक शृंखला के रूप में प्रकाशित हुई। उनकी दूसरी किताब थी ‘हिंद स्वराज।’ इसमें उन्होंने स्वदेशी आधारित स्वराज व आत्मनिर्भरता का विचार दिया। यह उन्होंने लंदन से दक्षिण अफ्रीका जाते हुए १३, से 22 नवंबर 1909 में लिखी। महात्मा गांधी ने पुणे के आगा खां पैलेस जेल में रहते 28 अगस्त से 18 दिसंबर 1942 के बीच ‘आरोग्य की कुंजी’ लिखी थी। किताब में गांधीजी किसी डॉक्टर की भांति नुस्खे बताते नज़र आए हैं। वे मानव-शरीर के अनोखे-भेद कुशल डॉक्टर की भांति बताते चले जाते हैं। वे हवा, पानी, शारीरिक-खुराक, मसाले, चाय, मादक-पदार्थ, अफीम, ब्रह्मचर्य, पृथ्वी, आकाश, तेज, चाय, कॉफी, कोको, ताड़ी तक की अच्छी जानकारी देते हैं। उनके लेखन में राजनीतिक और बाल विवाह प्रथा पर रोक, शराबबंदी,अस्पृश्यता, स्वच्छता और राष्ट्र निर्माण जैसे विषय प्रमुख रहे।
दक्षिण अफ्रीका के नेटाल स्थिति दादा अब्दुल्ला एंड सन्स कंपनी में वकील के बतौर गांधीजी को सालाना 15 हजार डॉलर का वेतन दिया जाता था। यदि आज की महंगाई दर और अन्य आर्थिक तत्वों को ध्यान में रखकर हिसाब करें तो यह 12 लाख रुपए सालाना से ज्यादा रकम होती है, जिससे उस वक्त वे भारत के 5 फीसदी सबसे धनी लोगों की बिरादरी में शामिल हो सकते थे। अब्दुल्ला एंड सन्स का जो मामला उन्हें दक्षिण अफ्रीका लाया था, वह मई 1894 में खत्म हो गया था और गांधीजी भारत लौटने की तैयारी करने लगे थे। लेकिन नेटाल सरकार के एक बिल में सिर्फ यूरोपीय मूल के लोगों को मताधिकार देने के प्रस्ताव ने उनका ध्यान खींचा और उन्होंने इसके खिलाफ भारतीयों की मदद करने का मन बना लिया। इसकी बजाय वे भारत लौटकर वकीली जारी रखते तो निश्चित ही अब्दुल्ला कंपनी से अधिक अर्जित कर पाते। गांधीजी के निःस्वार्थ कार्यों और वहां जमी वकालत को देखते हुए तो ऐसा लगने लगा था कि जैसे वे नैटाल में बस गए हों। 1896 के मध्य में वे अपने पूरे परिवार को अपने साथ नैटाल ले जाने के उद्देश्य से भारत आए। अपनी दक्षिण अफ्रीका की दूसरी यात्रा के बाद गांधीजी में अद्भुत बदलाव आया। पहले वे अंग्रेजी बैरिस्टर जैसा जीवन जीते थे किंतु अब वे मितव्ययिता को अपने जीवन में स्थान देने लगे। उन्होंने अपने खर्च और अपनी आवश्यकताओं को कम कर दिया। गांधीजी के मुताबिक उन्होंने ‘जीने की कला’ सीखी। कपड़ा इस्तरी करने, सिलाई आदि काम वे खुद करने लगे। वे अपने बाल खुद काटते। साफ-सफाई भी करते। वे प्रतिदिन दो घंटे का समय एक चैरिटेबल अस्पताल में देते, जहां वे एक कंपाउंडर की हैसियत से काम करते थे।
गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में 1893 और 1915 के बीच रहते हुए डर्बन, प्रिटोरिया और जोहानिसबर्ग में तीन फुटबॉल क्लब बनाए थे। सबका नाम रखा पैसिव रेसिस्टेंस सॉकर क्लब। वे मैच के दौरान पेम्फ्लैट बांटकर लोगों से आंदोलनों में शामिल होने का आह्वान करते। इसीसे उन्होंने अश्वेत लोगों के लिए समान अधिकार हासिल किए। वे फुटबॉल टीमों को संबोधितक करके और हॉफ टाइम में लोगों को भाषण देकर प्रेरित करते थे।
जिस ब्रिटेन के खिलाफ गांधीजी ने आंदोलन किए उसने गांधी शताब्दी वर्ष में उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया था। मार्च 2015 में लंदन के पार्लियामेंट स्क्वैयर पर गांधीजी की 9 फीट ऊंची कांसे की प्रतिमा भी स्थापित की।
राष्ट्रपिता ने दुनियाभर में लाखों लोगों को अहिंसा और सत्याग्रह के लिए प्रेरित किया। लेकिन शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित पांच विश्व नेताओं मार्टिन लुथर किंग जूनियर, दलाई लामा, अांग सान सू की, नेल्सन मंडेला और अदोल्फो पेरेज एस्क्वीवेल (अर्जेंटीना) ने औपचारिक रूप से स्वीकार किया कि वे गांधी दर्शन से प्रभावित रहे हैं। नोबेल शांति पुरस्कार के लिए गांधीजी के नाम पर 1937, 1938, 1939 और 1947 पर विचार किया गया था। 1948 में भी उनका नामांकन हुआ था, लेकिन जनवरी में ही उनकी हत्या हो गई। उस साल नोबेल समिति ने यह कहते हुए किसी को भी इस सम्मान से नहीं नवाज़ा कि ‘कोई भी योग्य व्यक्ति नहीं था।’ 2006 में नोबेल समिति ने कहा था कि गांधीजी को यह सम्मान न दे पाने का उसे खेद है।

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