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यहां कांटे के झूले पर झूलती है कुंवारी लड़की, यहां ऐसे मनाया जाता है दशहरा


यहां न रावण का पुतला जलाया जाता है और न ही रामलीला खेली जाती है।

छत्तीसगढ़ के वनांचल बस्तर में किसी को राम और रावण से कोई सरोकार नहीं है। यहां न रावण का पुतला जलाया जाता है और न ही रामलीला खेली जाती है।

यहां तो अनूठा दशहरा मनाया जाता है जिसकी अवधि 75 दिन की होती है। इसमें अनेक रस्में होती हैं और 13 दिन तक दंतेश्वरी माता समेत अनेक देवी देवताओं की पूजा की जाती है।

इस दौरान देश-विदेश के 600 साल पुरानी इस परंपरा को देखने आते हैं। जानिए बस्तर दशहरा के बारे में...

75 दिवसीय पर्व की शुरुआत हरेली अमावस्या से होती है जो क्वांर माह तक चलता है। इसमें सभी वर्ग, समुदाय और जाति-जनजातियों के लोग पूरे हर्षोल्लास के साथ हिस्सा लेते हैं।

- इस पर्व में राम-रावण युद्ध के प्रति नहीं बल्कि बस्तर मी मां दंतेश्वरी माता के प्रति अगाध श्रद्धा झलकती है।

ऐसे होती है पर्व की शुरुआत

- इस पर्व की शुरुआत हरेली अमावस्या को माचकोट जंगल से लाई गई लकड़ी (ठुरलू खोटला) पर पाटजात्रा रस्म पूरी करने के साथ होती है।

- इसके बाद बिरिंगपाल गांव के ग्रामीण सीरासार भवन में सरई पेड़ की टहनी को स्थापित कर डेरीगड़ाई रस्म पूरी करते हैं। इसके बाद विशाल रथ निर्माण के लिए जंगलों से लकड़ी लाने की प्रक्रिया शुरु हो जाती है।

- झारउमरगांव व बेड़ाउमरगांव के ग्रामीणों को रथ निर्माण की जिम्मेदारी निभाते हुए दस दिनों में पारंपरिक औजारों से विशाल रथ तैयार करते हैं।

कांटे के झूले पर झूलती है कुंवारी कन्या

- इस पर्व में काछनगादी की पूजा का विशेष प्रावधान है। रथ निर्माण के बाद पितृमोक्ष अमावस्या के दिन ही काछनगादी पूजा संपन्न की जाती है।

- इस पूजा में मिरगान जाति की बालिका को काछनदेवी की सवारी कराई जाती है। ये बालिका बेल के कांटों से तैयार झूले पर बैठकर रथ परिचालन व पर्व को सुचारु रूप से शुरु करने की अनुमति देती है।

- इसके दूसरे दिन गांव आमाबाल के हलबा समुदाय का एक युवक सीरासार में 9 दिनों की निराहार योग साधना में बैठ जाता है। ये पर्व को निर्विघ्न रूप से होने और लोक कल्याण की कमाना करता है।

- इस दौरान हर रोज शाम को दंतेश्वरी मां के छत्र को विराजित कर दंतेश्वरी मंदिर, सीरासार चौक, जयस्तंभ चौक व मिताली चौक होते रथ की परिक्रमा की जाती है।

गोलियां दागकर दी जाती है सलामी

- रथ में माईजी के छत्र को चढ़ाने और उतारने के दौरान बकायदा सशस्त्र सलामी दी जाती है। भले ही वक्त बदल गया हो और साइंस ने तरक्की कर ली हो पर आज भी ये सब पारंपरिक तरीके से होता है। इसमें कहीं भी मशीनों का प्रयोग नहीं किया जाता है।

- पेड़ों की छाल से तैयार रस्सी से ग्रामीण रथ खींचते हैं। इस रस्सी को लाने की जिम्मेदारी पोटानार क्षेत्र के ग्रामीणों पर होती है।

ऐसा है इस पर्व में बलि का विधान

- इस पर्व के दौरान हर रस्म में बकरा, मछली व कबूतर की बलि दी जाती है। वहीं अश्विन अष्टमी को निशाजात्रा रस्म में कम से कम ६ बकरों की बलि आधी रात को दी जाती है।

- इसमें पुजारी, भक्तों के साथ राजपरिवार सदस्यों की मौजूदगी होती है। रस्म में देवी-देवताओं को चढ़ाने वाले 16 कांवड़ भोग प्रसाद को तोकापाल के राजपुरोहित तैयार करते हैं।

- जिसे दंतेश्वरी मंदिर के समीप से जात्रा स्थल तक कावड़ में पहुंचाया जाता है।

- निशाजात्रा का दशहरा के दौरान विशेष महत्व है। इस परंपरा को कैमरे में कैद करने विदेशी पर्यटकों में भी उत्साह होता है।