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औरंगजेब ने कटवाए थे मूर्तियों के सिर, एक्सपर्ट भी नहीं समझे मंदिर का रहस्य



प्रदेश में यूं तो कई प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर हैं, लेकिन सभी उतने प्रसिद्ध नहीं हो सके, जितना उन्हें होना चाहिए। ऐसे ही एक अति प्राचीन मंदिर के बारे में



- बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में हुआ था। गजेडियर के मुताबिक इस मंदिर का निर्माण सोमवंशी क्षत्रिय घराने के राजा ने करवाया था।



- मंदिर की दीवारों व बनावट में की गई नक्काशियां व विभिन्न प्रकार के आकृतियां को देखने के बाद इतिहासकार व पुरातत्वविद इसे 11वीं शताब्दी का बना हुआ मानते हैं। मंदिर के गेट पर बनीं आकृतियां मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध खजुराहो मंदिर से काफी मिलती हैं।


- इस मंदिर में आठ हाथों वाली अष्टभुजा देवी की मूर्ति है। ग्रामीण अजीत सिंह बताते हैं कि पहले इस मंदिर में अष्टभुजा देवी की अष्टधातु की प्राचीन मूर्ति थी। 15 साल पहले वह चोरी हो गई। जिसके बाद सामूहिक सहयोग से ग्रामीणों ने यहां अष्टभुजा देवी की पत्थर की मूर्ति स्थापित करवाई।


 ASI के रिकॉर्ड्स के मुताबिक मुगल शासक औरंगजेब ने 1699 ई. में हिन्दू मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया था। उस समय इस मंदिर को बचाने के लिए यहां के पुजारी ने मंदिर का मुख्य मार्ग मस्जिद के आकार में बनवा दिया था, जिससे भ्रम पैदा हो और यह मंदिर टूटने से बच जाए।


- मुगल सेना इसके सामने से लगभग पूरी निकल गई थी, लेकिन एक सेनापति की नजर मंदिर में टंगे घंटे पर पड़ गई। उसने सेना को मंदिर के अंदर जाने के लिए कहा और यहां स्थापित सभी मूर्तियों के सिर काट दिए। आज भी इस मंदिर की मूर्तियां वैसी ही हाल में देखने को मिलती हैं।


 इस मंदिर के मेन गेट पर एक विशेष भाषा में कुछ लिखा है। यह कौन-सी भाषा है, यह समझने में कई पुरातत्वविद और इतिहासकार फेल हो चुके हैं।


- कुछ इतिहासकार इसे ब्राह्मी लिपि बताते हैं तो कुछ उससे भी पुरानी भाषा, लेकिन यहां क्या लिखा है, यह अब तक कोई नहीं समझ सका।


- मंदिर की प्राचीनता का प्रमाण इस बात से भी लगाया जा सकता है कि मंदिर की दीवारों में की गई नक्काशियां सिन्धुघाटी सभ्यता में मिली पत्थर की मूर्तियों व नक्काशियों से बिलकुल मिलती है।
- 2007 में दिल्ली से आए कुछ पुरातत्वविदों ने इसे 11वीं शताब्दी का मंदिर बताया था। मंदिर की खासियत है कि इसके मुख्य मार्ग के बाद प्रांगण में मां का मंदिर व मूर्ति स्थापित है। इतिहास में दर्ज उल्लेखों के अनुसार ऐसे मंदिर सिन्धु घाटी सभ्यता में होते थे।



इस बारे में जब मंदिर के पुजारी रामसजीवन गिरि ने बताया कि इस मंदिर की प्राचीनता का अंदाजा लगा पाना काफी मुश्किल है। इतिहास में इस मंदिर का उल्लेख मिलता है, लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा से इस मंदिर की हालत बेहद दयनीय हो गई है।


- इसके जीर्णोद्धार में ग्रामीण काफी मदद करते हैं, लेकिन इस ऐतहासिक धरोहर को बचने के लिए प्रशासनिक मदद बहुत जरूरी है।