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16 सितंबर का इंतजार कर रहा है ये लड़का, बाबा पर है पिता की हत्या का आरोप


बाबा से जीत पाना नामुमकिन नहीं, पिता को इंसाफ दिलाने 15 साल से लड़ रहा बेटा

एक आदमी जिसके पीछे करोड़ों समर्थकों का साथ, सत्ता जिसके हाथ में हो, साथ ही कानून व्यवस्था को जिसने खरीदा हुआ हो। ऐसे व्यक्ति से जीत पाना मुश्किल तो है लेकिन नामुमकिन नहीं। अंशुल छत्रपति 15 साल से पिता रामचंद्र छत्रपति को न्याय दिलाने के लिए लड़ रहे हैं।

गौरतलब है कि 24 अक्टूबर 2002 को रामचंद्र छत्रपति को गोलियों से भून डाला था। उनके बेटे अंशुल छत्रपति शुक्रवार को फोटोग्राफी एग्जिबीशन के लिए चंडीगढ़ में थे। बोले- 25 अगस्त को गुरमीत राम रहीम को दोषी करार देने के बाद पंचकूला में हिंसा का जो खौफनाक मंजर हुआ। ऐसा मैंने कई बार देखा है। अंशुल का कहना है कि अब उन्हें 16 तारीख का इंतजार है।

2002 में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या कर दी गई थी। तब से उनके हत्यारांे को सजा दिलाने के लिए लड़ रहे हैं अंशुल छत्रपति। शुक्रवार को चंडीगढ़ में उनसे हमारी बात हुई ...

- अंशुल ने कहा कि जब पिताजी ने पूरा सच अखबार में गुरमीत राम रहीम के खिलाफ खबर और गुमनाम चिट्ठी भी छापी।

 इसके बाद एक ओर लेखा-जोखा अखबार ने भी ऐसा ही किया। तब गुरमीत सिंह के गुंडो ने लेखा-जोखा के ऑफिस में तोड़-फोड़ की, उसके संपादक का पीछा करके उन्हें जलाकर मारना चाहा, फोटो स्टेट की दुकानों में आग लगा दी। लेकिन फिर भी पिता जी गुंडों की इन हरकतों के बारे में बेखौफ लिखते रहे। कई बार स्टाफ के लोगों ने उन्हें ऐसा करने से मना भी किया और कहा कि एक एक दिन आपको ये लोग मार देंगे।

- अशुल कहते हैं को पापा कहते थे कि मरना तो सबको एक दिन है ही। सच्चा पत्रकार वहीं होता है जो जूता नहीं सीने पर गोली खाता है। उनकी इन बातों से एक बात तो जाहिर थी कि कहीं कहीं उन्हें भी पता था कि अब उनके साथ कुछ बुरा होने वाला है इसके लिए उन्होंने खुद को मानसिक रूप से तैयार कर लिया था और आखिर में ऐसा ही हुआ।

- हिंसा का दौर फिर मेरे साथ शुरू हुआ, जब मैं न्याय पाने के लिए अदालत में गया। पुलिस, सीबीआई और अदालत पर दबाव बनाने के लिए डेरे के गुंडो ने हिंसा जारी रखी। इतना सब होने के बाद भी मैं पीछे नहीं हटा। यह हौसला मुझे अपने माता-पिता की विचारों मिला। मैं अपने पिता का शुक्रगुजार हूं, जिन्होंने मेरा हर मोड़ पर साथ दिया।

-अंशुल बोले- जब जज ने गुरमीत सिंह को सजा सुनाई। ऐसा लगा कि पिता का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। अब पिता जी के केस में 16 सितंबर को फाइनल ऑरग्यूमेंट होनी है। अब इसी दिन का इंतजार है। इसमें मुझे इंसाफ की पूरी उम्मीद है।

अंशुल बोले- पिता पत्रकारिता के क्षेत्र में आने से पहले वकालत करते थे। वहीं लीडरशिप में भी वह आगे रहे। कॉलेज में लीडरशिप करने से वह कभी पीछे नहीं हटे। अगर वह वकील या पत्रकार होते तो नेता होते।

-अंशुल बताते हैं- गोली लगने के बाद पिता को अस्पताल में भर्ती करवाया गया। कुछ दिनों के बाद पिता जी की हालत में सुधार रहा था। लेकिन एक दिन अचानक फिर से उनकी तबीयत बिगड़ गई। उनको दिल्ली के अस्पताल में रैफर कर दिया गया।

जब उन्हें लेकर जा रहे थे तो उन्होंने ऑक्सीजन मास्क उतारकर पूछा- कहां लेकर जा रहे हो। मैंने कहा दिल्ली के अस्पताल में। मुझे क्या पता था ये लाइन जो मैं अपने पिता के मुंह से सुन रहा हूं वो आखिर होगी। मेरे पिता 28 दिन अस्पताल में थे। उनके साथ अस्पताल में कुछ गड़बड़ हुई थी। अगर सरकार और पुलिस उसी समय कार्यवाई करती तो जल्द ही न्याय मिल जाता।

यह लड़ाई परिवार की होकर मीडिया की बन गई

अंशुल बोले- न्याय की यह लड़ाई हमारे परिवार की नहीं, बल्कि मीडिया की थी। क्योंकि हमला एक पत्रकार पर सच लिखने पर हुआ था। सही शब्दों में कहें तो पत्रकारिता पर हमला किया गया था। उस समय मीडिया वालों ने साथ भी दिया और फैसला लिया कि हम गुरमीत सिंह की कोई ऐड या सतसंग की खबर नहीं छापेंगे।

इसी बीच पिता जी की मौत हो गई। कुछ समय बाद मीडिया का भी जोश ठंडा पड़ गया। तब अहसास हुआ कि अब यह लड़ाई सिर्फ मेरे परिवार की लड़ाई बनकर रह गई है। जब सीबीआई में चार्जशीट जारी की थी तो अदालत ने एक बार बीजेपी नेताओं से मिलने को भी कहा। जब उनसे मिलने गए तो नेताओं ने बुरा व्यवहार किया।

इसी बीच 2014 में किन्हीं कारणों की वजह से पूरा सच अखबार बंद हो गया। हम पूरी तरह खेती बाड़ी पर ही निर्भर हो गए। दुख तो बहुत हुआ लेकिन संघर्ष जारी रखा। लेकिन अब यह लड़ाई फिर से परिवार की होकर मीडिया की बन गई है।