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राजा-महाराजा भी करते थे कैमरे का यूज, रखते थे इस खास जगह पर


 हर कोई फोटोग्राफी का शौकीन हो गया है लोग अपने मोबाइल से ही फोटो क्लिक करते हैं लेकिन इसकी शुरुआत कैसे हुई। उस दौर के कैमरा लाइफ की ऐसी ही सीरीज देखने को मिल रही है वर्ल्ड फोटोग्राफी डेपर आयोजित विंटेज कैमरा एग्जीबिशन में।एग्जीबिशन में १८६०, से 2003 तक के कैमरे शामिल..

एग्जीबिशन का आयोजन डीबी सिटी के सेंट्रल एट्रियम में किया गया है।
- इस एग्जीबिशन में 1860 से 2003 तक के कैमरा शामिल हैं जिसमें कई रेंज उपलब्ध हैं।
- एग्जीबिशन में 100 से ज्यादा विंटेज कैमरा एग्जीबिट किए गए हैं जिसमें 5 पीढ़ियों द्वारा इकट्ठे किये गए कैमरे एग्जीबिट किए गए है, इसमें ज्यादातर कैमरों के कलेक्शन प्रोफेसर एस के मावल ने किए हैं।

राजा महाराजा रखा करते थे पॉकेट कैमरा
- पॉकेट कैमरा १९१६, से 1925 तक रहा था, राजा,महाराजा और राजवाड़े अपनी जेब में रखा करते थे।
- ये आम लोगों की पहुंच से दूर था जिसकी कीमत उस जमाने में 20 डॉलर हुआ करती थी।
- इस एग्जीबिशन में रखा गया पॉकेट कैमरा माधव राव सिंधिया के फादर जीवाजी राव सिंधिया लंदन से लाए थे।

ऑप्टिशियन बनाया करते हैंडमेड कैमरा
- 1890 में आए हैंडमेड कैमरा इस दौर में ऑप्टिशियन बनाया करते है।
- ये 1850 के आस पास का है जो आज भी वर्किंग में हैं। कैप निकल कर एक्सपोजर दिया और बैंड कर दिया।

- 1890 का 35 एमएम मूवी कैमरा है जिस जमाने में कपि साउंड नहीं होती थी उससे दौरान फिल्म शूटिंग के लिए इस्तेमाल किया जाता था।

- फ्रेम पर सेकंड का फर्क जाता था क्योंकि ये हाथ से चलाई जाती थी।
गन पाउडर जलाकर क्रिएट करते थे फ्लैश लाइट

- उस जमाने में ना लाइट थी ना ही केबल इसीलिए फ्लैश लाइट के लिए फ्लैश पाउडर फ्लैश लाइट का इस्तेमाल किया जाता था।

- स्टिल की प्लेट पर गन पाउडर डालते थे और इसे लाइटर इतनी चिंगारी से जलाते थे।
- जलते ही इससे जो रोशनी निकलती है उसे फ्लैश लाइट की तरह इस्तेमाल में लाया जाता था।
रोल निकालने फोड़ देते थे कैमरा

- डिस्पोजल कैमरा, ये एक अनोखा यूज एंड थ्रो कैमरा था।
- कंपनी की तरफ से रोल या फिल्म दी जाती थी। रोल निकालने के लिए कैमरा तोड़ डालते थे।
- इसे टूरिस्ट कैमरा भी कहा जाता था।

- इसी दौरान शुरू में एक स्कीम भी निकाली गई थी लोगों को एक कैमरा और फिल्म के साथ एक कैमरा मुफ्त दिया जाता था।