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दर्शन देने के बाद गायब हो जाता है ये मंदिर, 6 दिन के भगवान ने मारा था राक्षस


देश में शिव के मंदिर तो हजारों हैं लेकिन गुजरात के वड़ोदरा और भरूच से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर जम्बूसर तहसील के कावी-कम्बोई गांव के पास खंभात की खाड़ी में 150 साल पुराना मंदिर अनोखा है। मही सागर संगम स्थान पर स्थित इस मंदिर को स्तंभेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर सुबह और शाम कुछ समय के लिए डूब जाता है। किस तरह खास है ये मंदिर

-समंदर शिवलिंग का अभिषेक कर के वापस चला जाता है।

-दरअसल ऐसा ज्वार-भाटे के कारण होता है। यह मंदिर खंभात की खाड़ी बीच में स्थित है।

-मंदिर में शिवलिंग के दर्शन तभी कर सकते हैं जब खाड़ी में पानी कम होता है।

शिवालय का उल्लेख ‘महाशिवपुराण’ में भी मिलता है

-मंदिर से जुड़े लोगों का कहना है कि यह सिलसिला सदियों से चला आ रहा है।

-इस शिवालय का उल्लेख ‘महाशिवपुराण’ में भी मिलता है।

-मंदिर प्रशासन द्वारा खास तौर पर पर्ची छपवाई गई है। जिसमें ज्वार-भाटे का समय दर्शाया गया है। ताकि वहां आने वाले श्रद्धालुओं को परेशानी न हो।

ताड़कासुर का वध किया

-इस मंदिर के पीछे पौराणिक मान्यता यह है कि राक्षस ताड़कासुर कठोर तपस्या से शिव जी को प्रसन्न कर उनसे वरदान मांगा था की उसे सिर्फ शिव जी का पुत्र ही मार सकेगा और वह भी छह दिन की आयु का।

-वरदान मिलते ही ताड़कासुर ने हाहाकार मचाना शुरु कर दिया. देव-ऋषि-मुनि, आमजन सभी बेहद परेशान थे. अंतत: देवता महादेव की शरण में पहुंचे।

-शिव-शक्ति से श्वेत पर्वत के कुंड में उत्पन्न हुए शिव पुत्र कार्तिकेय ने ने ही मात्र 6 दिन की आयु में ताड़कासुर का वध किया।

-जब कार्तिकेय को पता चला की ताड़कासुर भोलेनाथ का परम भक्त था, तो वे काफी व्यथित हुए. फिर भगवान विष्णु ने कार्तिकेय से कहा कि वे वधस्थल पर शिवालय बनवा दें। इससे उनका मन शांत होगा।

-भगवान कार्तिकेय ने ऐसा ही किया। सभी देवताओं ने मिलकर महिसागर संगम तीर्थ पर विश्वनंदक स्तंभ की स्थापना की। जिसे आज स्तंभेश्वर तीर्थ के नाम से जाना जाता है।

-स्तंभेश्वर महादेव मंदिर में महाशिवरात्रि और हर अमावस्या पर मेला लगता है।

-दूर-दूर से श्रद्धालु दरिया द्वारा शिवशंभु के जलाभिषेक का अलौकिक दृश्य देखने यहां आते हैं।