Header Ads

जिसे देखकर डर जाते थे लोग, भाग जाते थे बच्चे, ऐसी है उसकी कहानी


बिहार के नवादा का 16 साल का मिथुन चौहान अब आम इंसान की तरह जीवन जी सकेगा। यह हुआ है इंदौर के एक डॉक्टर और उनकी टीम की बदौलत, जिन्होंने प्लास्टिक सर्जरी के जरिए काफी हद तक उसके ट्यूमर हटा दिए हैं। मिथुन वही बच्चा है, जिसके पूरे शरीर में ट्यूमर निकले हुए थे। ट्यूमर के कारण उसे असहनीय दर्द तो सहना ही पड़ता था। उसका चेहरा इतना डरावना था कि हम उम्र साथी भी स्कूल में साथ खेलने के बजाय दूर भाग जाते थे। इस वजह से उसे स्कूल छोड़ना पड़ा था। मिथुन के सर्जरी पर एक डाक्यूमेंट्री बनाई गई है। ऐसी है द बबल व्रैप बॉय की कहानी

- मिथुन का जब जन्म हुआ तो घर में खुशियां की बजाय भययुक्त मातम छा गया। नवजात के पूरे शरीर पर फफोले उठे हुए थे। मेडिकल भाषा में इन्हें न्यूरोफाइब्रोमेटोसिस ट्यूमर कहा जाता है। ये ट्यूमर बहुत ही पीड़ादयी होते हैं। बच्चे की वीभत्स काया ने उसे उपहास का पात्र बना दिया। मां-बाप के पास इतने रुपए नहीं थे कि वे उसका इलाज करवा पाते।

- मिथुन ने 16 साल तक यह पीड़ा सही। इसी बीच चेन्नई के संजय पांडे ने द बबल व्रेप बॉय नाम से एक स्टोरी पब्लिश की। इसके प्रकाशित होने के बाद वे उसकी मदद के लिए प्रयासरत हो गए। इसके बाद इंदौर के प्लास्टिक सर्जन डॉ. अश्विनी दास और उनकी टीम डॉ. अंजलि दास, डॉ. गिरीश वर्मा, डॉ. आवेग भंडारी, डॉ. सुधीर अग्निहोत्री ने मिथुन के इलाज की जिम्मेदारी ली।

- डॉ.दास ने बताया कि मिथुन की फोटो देखने के बाद उसके घरवालों से मिला तो उन्होंने बताया कि बीमारी की वजह से मिथुन को स्कूल से निकाल दिया गया, क्योंकि दूसरे बच्चे उसे देख कर डर जाते थे, इसी वजह से उसके दोस्त भी नहीं थे। वह भेड़-बकरियों को चराता और उन्हीें के साथ खेलता था। पूरे शरीर में ट्यूमर इतने थे कि न पूरी तरह से आंखें खुल नहीं पाती थी और ना ही मुंह। न तो वह रोटी खा सकता था और न ही करवट कर सो सकता था। हम उसे पूरी तरह की खूबसूरती तो नहीं दे सकते थे, लेकिन उसके दैनिक जीवन को सामान्य बनाने की एक कोशिश जरूर करते थे।

- डॉ दास कहते हैं कि मिथुन की कहानी और संजय की कोशिश से मुझे बहुत हिम्मत मिली। अस्पताल के डायरेक्टर सुनील तिवारी ने बताया कि एक ओर संजय और दास मिलकर मिथुन के लिए पैसे इकठ्ठा कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर 29 जनवरी को मिथुन को पहली बार सर्जरी के पूर्व जांच के लिए इंदौर लाया गया, जहां उसकी सर्जरी होनी थी।

- एक महीने बाद मिथुन की सर्जरी प्लान की गई। इलाज के लिए जितना फंड इकट्ठा हुआ था, उससे ज्यादा खर्चा होने की आशंका थी। सिर्फ मिथुन के इलाज ही नहीं, बल्कि उसके परिवार और डॉक्यूमेंट्री बनाने वाली टीम के रहने-खाने कि व्यवस्था पर भी हमें करनी थी। यह पूरा काम बेहद गोपनीय तरीके से किया गया, क्योंकि मिथुन के केस में बेहद जटिल सर्जरी होना थी और उसके रिकवर होने के 50 फीसदी ही लक्षण थे, इसलिए उन्हें किसी होटल में नहीं ठहराया जा सकता था।

- न्यूरोफाइब्रोमेटोसिस ट्यूमर जो कि मिथुन के सारे शरीर पर फैले हुए थे, जिसकी वजह से मिथुन को द बबल व्रेप नाम दिया गया। 8 महीने के कठिन संघर्ष में दो बड़ी सर्जरी और इस संघर्ष से जुड़े कुछ संवेदनशील पलों को 45 मिनट की डॉक्यूमेंट्री के रूप में तैयार किया गया, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लाइव किया गया।
- द बबल व्रैप बॉय के नाम से यह डॉक्यूमेंट्री यू ट्यूब पर मौजूद है। हाल ही में इसका प्रसारण यूके के चैनल पांच पर लाइव किया गया है और जल्द ही ये अन्य नॉलेज चैनल पर लाइव किया जाएगा, जिससे इंदौर का नाम मेडिकल हब के रूप में दुनिया भर में मशहूर हो गया है।
कुछ इस तरह हुआ इलाज
 मिथुन की सर्जरी की तैयारी पूरी हो चुकी थी तभी शुरुआती जांच में पता लगा उसे ब्रेन में भी ट्यूमर हैं। उस समय तो लगा जैसे अब यह सर्जरी संभव नहीं हो पाएगी पर जांच में पता चला की दिमाग का यह ट्यूमर मिथुन को नुकसान नहीं पहुंचा रहा था।

- न्यूरोफिजीशियन डॉ. आवेग भंडारी के मार्गदशन में सिटी स्कैन और एमआरआई की रिपोर्ट के बाद पहला ऑपरेशन शुरू किया गया। करीब साढ़े चार घंटे चले इस ऑपरेशन में मिथुन के मुंह, नाक और गालों से करीब आधा किलो के ट्यूमर निकले गए। ऑपरेशन के बाद मिथुन को आईसीयु में शिफ्ट करने के बाद सुबह 6 बजे डॉ. दास को फ़ोन आया की मिथुन ने प्रतिक्रिया देनी बंद कर दी है।

- इसके बाद वे वे हॉस्पिटल पहुंचे, तो जांच में पाया कि शुगर लेवल की कमी के कारण मिथुन निष्क्रिय हो गया था। उसे ग्लूकोज दिया गया और वह कुछ समय में ठीक महसूस करने लगा। 10 दिन के बाद जब उसे अपने गांव भेजा गया तब डॉक्टर के मन में घाव में पस पडऩे और इन्फेक्शन का डर था और ऐसा हुआ भी 15 दिन बाद चेहरे के घाव में पस पडऩे के कारण मिथुन को तेज़ बुखार आ गया। उसका गांव भी इतना छोटा है कि वहां न तो कोई अस्पताल है और ना ही एक भी डॉक्टर।

- इसके बाद उसके गांव में नर्सिंग की पढ़ाई कर चुके एक युवक की मदद से उसकी ड्रेसिंग करवाई गई। वहीं लगातार फ़ोन पर डॉक्टर से संपर्क में रहता। वह मिथुन को शहर से दवाई लाकर भी देता रहा। बुखार कम होने पर मिथुन को पटना ले जाकर अस्पताल में ईलाज कराया गया। जहां वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिये डॉ. दास ने पटना के डॉक्टरों के साथ उसका इलाज किया।

जब मिथुन दूसरी बार सर्जरी के लिए आया तो उसकी पलकों, माथे, कान और गाल पर बचे हुए ट्यूमर को हटाया गया। पलक और माथे के ट्यूमर की वजह से उसकी आंखें कमजोर हो गई थीं और उसे देखने में भी दिक्कत होने लगी थी। दूसरी सर्जरी में मिथुन के ट्यूमर हटाने के साथ पेट की चमड़ी से माथा बनाया गया और कान भी रीकंस्ट्रक्ट किए गए। इस सर्जरी के महीने भर बाद जब मिथुन फाइनल चेकअप के लिए आया तो उसकी आंखों में अलग ही चमक और आत्मविश्वास नजर आ रहा था।

- उसके पिता कहते हैं कि अब मेरा बेटा आम बच्चों की तरह स्कूल जाता है, होली खेलता है और सबसे ख़ास बात उसने 17 सालों के बाद रोटी का स्वाद अपने हाथों से चखा। इससे ज्यादा ख़ुशी की बात और क्या हो सकती है।