जिस केसर स्पा में झूला झूलती नहाती थीं रानियां उसी को बना लिया था जौहर कुंड
मेवाड़ में अलाउद्दीन खिलजी से हुए युद्ध में रानी पद्मिनी का जौहर सब जानते हैं। इसी तरह ग्वालियर के किले में भी दो बार राजपूत रानियां जौहर कुंड की जलती चिता में हंसते-हंसते कूद गईं थीं।
ग्वालियर किले पर मान मंदिर महल में रानियों के लिए एक भव्य स्पा बना हुआ था। इस स्पा में एक शानदार हिंडोला भी डाला गया था।
- तोमर राजवंश की रानियां यहां आकर झूला झूलती थी और इसके बाद स्पा में उनको केसर से सुगंधित किए गए पानी से नहलाया जाता था।
- सन 1523 में ग्वालियर पर इब्राहीम लोदी ने आक्रमण किया था। राजा मानसिंह तोमर की उस वक्त मृत्य हो चुकी थी औऱ उनका पुत्र विक्रमादित्य राजा बन चुका था। पिता की मृत्य के बाद से विक्रमादित्य को राज्य की जिम्मेदारी संभाले थोड़ा ही वक्त हुआ था
कि, पिता सिकंदर लोदी की राजा मान सिंह के हाथों हुई 2 पराजयों का बदला लेने इब्राहीम लोधी और उसका सिपहसालार आजम हुमायूं आ पहुंचा।
- बदले की आग में धधकता इब्राहीम और आजम पूरी तैयरी के साथ पहले से तीन गुनी सेना और लंबी लड़ाई की रणनीति बनाकर आए थे।
- हाल ही में राजा बना विक्रमादित्य पिता की मृत्यु के बाद के संस्कार पूरे कर शोक से बाहर आया और किले की व्यवस्थाओं में जुटा हुआ था, उसका ध्यान ग्वालियर के बाहर राज्य की गढ़ियों तक अब तक नही पहुंच सका था।
- इब्राहीम रणनीति के तहत ग्वालिर की मददगार और रसद आपूर्ति कर सकने वाले ठिकानों और गढ़ियों को अपनी विशाल सेना से खत्म करता हुआ ग्वालियर पहुंचा और किले का घेरा डाल दिया। लंबे घेरे के बाद भी ग्वालियर फोर्ट के अंदर पहुंचे बगैर इब्राहीम की लाखों की फौज भी कुछ नही कर सकती थी।
- इब्राहीम के सेनापति आजम हुमायूं ने एक और रसद पहुंचे के सभी रास्ते बंद कर दिए, दूसरी ओर मान सिंह के चिढ़ने वाले राजपूत राजाओं की मदद से किले की ऐसी प्राचीर तलाश कर ली जो कमजोर थी। इस प्राचीर को बारूद से उड़ा कर किले में घुसने की राह बना ली गई।
केसर कुंड में धधकने लगीं जौहर की ज्वालाएं
-जिस केसर स्पा में रानियां गुलाब की पंखुड़ियों के साथ स्नान करती थीं, उसका पानी तुरंत खाली कराया गया और कुंड में आग लगा दी गई। केसर स्पा को जौहर कुंड बना दिया गया।
- लोदी सेनाओं के किले में प्रवेश की खबर मिलते ही विक्रामादित्य की 8 रानियों ने जौहर का फैसला कर लिया। रानियों ने तुरंत अपने स्नान के लिए बने केसर कुंड (स्पा) को जौहर कुंड में बदल दिया और धदकती आग में कूद गईं।
- इसके बाद विक्रमादित्य की सेनाओं ने घनघोर युद्ध किया, लेकिन इब्राहीम की लाखों की फौज के आगे हार नजर आने लगी। इब्राहीम को भी ग्वालियर की सेनाओं से डर लगने लगा, आखिर एक संधि का प्रस्ताव भेजा गया। विक्रमादित्य की अधिकांश सेना मारी जा चुकी थी और खुद भी गंभीर रूप से घायल हो चुके थे। लिहाजा संधि स्वीकार कर ली, ताकि भविष्य में शक्ति अर्जित कर वापसी की जा सकें।
- संधि के मुताबिक किला इब्राहीम को सौंपा गया, बदले में इब्राहीम ने विक्रमादित्य को राजा का दर्जा देते हुए अपना नया सेनापति बना कर आगरा का प्रशासक बना दिया।
इससे पहले 13 वीं शताब्दी में हुआ था जौहर
- सन 1210 में ग्वालियर पर प्रतिहार वंश के राजा मलय देव वर्मन का शासन था। कुतुबुद्दीन एबक ग्वालियर विजय का स्वप्न संजोए चला गया। उसके बाद उसके बाद इलतुतमिश ने ग्वालियर पर आक्रमण किया।
- महीनों की घेराबंदी के बाद जब इल्तुतमिश की फौज का हौसला टूटने लगा तो मौलवी बुलाए गए, उन्होंने सैनिको को अल्लाह के नाम पर जंग लड़ने का फतवा सुनाया तो सैनिक दोबारा जंग के लिए तैयार हुए। किले की रसद रुकी हुई थी। हजारों सैनिक सैनिक लंबी लड़आई मेंमारे जा चुके थे,
आखिरकार मयलवर्मन को भी वहीं रास्ता चुनना पड़ा जो अक्सर राजपूत चुनते आए थे।
- मलय देव वर्मन अपने बचे-खुचे सैनिकों के साथ मरणांतक युद्ध के लिए केसरिया बना पहन कर किले के दरवाजे खोल कर निकल गए और लड़ते-लड़ते शहीद हो गए।
- राजा के जाते ही किले के अंदर रानियां और 70 दूसरी राजपूत नारियां जौहर कि चिता में कूद गईं।

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