'इंदू सरकार' के राइटर का पलटवार- प्रिया पहले खुद को संजय की बेटी साबित करें
लखनऊ के राइटर अनिल पांडे ने लिखी है 28 जुलाई को रिलीज होने वाली मधुर भंडारकर की फिल्म इंदू सरकार। फिल्म विवादों में है
1975 में लगी इमरजेंसी पर बनी फिल्म 'इन्दू सरकार' रिलीज़ से पहले ही विवादों में आ गई है। फिल्म के कुछ डायलॉग और गांधी परिवार से जुड़ी बातों को लेकर फिल्म बैन करने की मांग की जा रही है। फिल्म के लेखक अनिल पांडे लखनऊ से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने एक्सक्लूसिव बातचीत में फिल्म से जुड़ी बातें शेयर की।
प्रिया पॉल कह रही हैं वो संजय गांधी की बेटी हैं, क्या फिल्म में ऐसा कोई किरदार है?...
उन्होंने मधुर भंडारकर से लेकर मुझे तक नोटिस भेजा है। मैं कहता हूं वो पहले साबित करें कि खुद संजय गांधी की बेटी हैं या नहीं। वो ऑब्जेक्शन कर रही हैं, पहले खुद क्लियर कर लें कि वो क्या हैं। फिल्म में ऐसा कोई किरदार नहीं है। यह किसी की पर्सनल स्टोरी नहीं है। ऑब्जेक्शन से पहले वो फिल्म देख लें।
ये तो मुझे भी नहीं पता। सेंसर बोर्ड ने 12-14 कट डाले हैं। फिल्म बिना देखे ही कुछ लोग बहुत टची हो रहे हैं। हर जगह प्रोटेस्ट हो रहा है। इलाहाबाद में तो एक आदमी ने पोस्टर बना दिया - मधुर भंडारकर का मुंह काला करने वाले को 1 लाख रु. इनाम। बिना देखे कैसे बवाल हो रहा है, समझ नहीं आ रहा।
मैंने मधुर भंडारकर के साथ 3 फिल्में की हैं। 'कैलेंडर गर्ल' के बाद हमने सोचा कि अब किसी मुद्दे पर काम करना चाहिए। हम दोनों को ही 70s का एरा काफी पसंद था और दोनों पोलिटिकली अवेयर भी हैं। बातों-बातों में इमरजेंसी का ज़िक्र हुआ। तभी 1975-77 के दौर पर काम करने का सोचा।
मैं कुलदीप नय्यर और कोमी कपूर के अलावा उस टाइम रहे कैदियों और लीडर्स से मिला। दिल्ली की नेहरू मेमोरियल लाइब्ररी में काफी स्टडी की। 4 महीने की रिसर्च के बाद स्क्रिप्ट तैयार हुई है।
इस रोल के लिए कई लोगों को अप्रोच किया गया, लेकिन किसी की डेट नहीं मैच हो रही थी तो कोई डर रहा था। उसी दौरान 'पिंक' मूवी आई थी। उसमें कीर्ति का परफॉरमेंस काफी पसंद आया। उनसे बात हुई और फाइनल कर लिया गया।
वो एक स्टैमरिंग पोएटेस हैं, जो कि अनाथ है। काफी सारे शेड्स हैं। कीर्ति ने बहुत अच्छे से निभाया है। कमाल की एक्ट्रेस हैं। हमें ख़ुशी है कि वो फिल्म का हिस्सा बनीं।
नहीं, हमने अप्रोच नहीं किया। उस वक़्त जो लोग थे, वो अब जिंदा नहीं हैं। हम कोई पॉलिटिकल फिल्म नहीं बना रहे थे। यह एक ह्यूमन ड्रामा है, जिसमें 30 परसेंट सच्चाई और 70 परसेंट इमेजिनिशन है। कहानी का बैक ड्रॉप इमरजेंसी है। कहानी एक कवित्री की है, जिसका कैरेक्टर पूरी तरह काल्पनिक है।
मैंने संजय गांधी के बारे में कोई पर्सनल रिसर्च नहीं किया। यह फिल्म उन पर बेस्ड नहीं है। जितना सब जानते हैं, उतना ही मैं भी जानता हूं।
इमरजेंसी के बहुत से फैक्ट हमने दिखाए हैं। मीसा कैदी बनाए गए लोगों के साथ हुई बदसलूकी जैसी बातों को कहानी में पिरोया हुआ है।
हम दोनों का ज्वाइंट एफर्ट है। स्क्रिप्ट में भंडारकर ने भी काफी कंट्रीब्यूट किया।
लखनऊ का रहनेवाला हूं। स्कूलिंग सीएमएस और कॉल्विन ताल्लुकदार से हुई। लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रैजुएशन किया। राइटर बनने की चाहत थी, इसलिए मुंबई गया। कई टीवी शोज़ लिखे, दो बार इंडियन टेली अवॉर्ड्स में नॉमिनेट हुआ। 2008 से फिल्मों के लिए लिखना शुरू किया। अब तक 'अगली-पगली', 'कैलेंडर गर्ल', 'दिल तो बच्चा है' जैसी फ़िल्में लिखी।


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