पाक हुक्मरान नहीं हुए थे राजी, वरना 1984 में हो जाती कारगिल की जंग
कारगिल की जंग 1999 में हुई थी, लेकिन पाकिस्तान ने इसका मंसूबा 1984 में ही बना लिया था।
26 जुलाई को कारगिल में भारत ने पाकिस्तान को खदेड़ कर जंग जीती थी। इस जीत को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। कारगिल की जंग 1999 में हुई थी, लेकिन पाकिस्तान ने इसका मंसूबा 1984 में ही बना लिया था। हालांकि, पाक हुक्मरान उस समय इस जंग के लिए तैयार नहीं हुए। कैसे शुरू हुई कारगिल की जंग...
1999 के कारगिल सेक्टर में मुजाहिदीनों की शक्ल में पाकिस्तानी सेना के जवानों ने कब्जा कर लिया था। शुरुआत में खुद भारतीय सेना पाक सैनिकों के इस कब्जे को मानने से इनकार कर रही थी। उन्हें अपनी नाकामियों के उजागर होने का शक था, लेकिन कई प्रेस रिपोर्ट में इस कब्जे की बात सामने आई। इसके बाद भारत सरकार ने कारगिल में बड़े ऑपरेशन की शुरुआत कर दी। कारगिल की लड़ाई को 16 साल बीत चुके हैं, लेकिन भारतीय सैनिकों की जांबाजी के किस्से आज भी लोगों के दिलो-दिमाग में बसे हैं।
आज भी खड़े हैं कई सवाल
इस लड़ाई की वजह क्या थी? आखिर क्यों पाकिस्तान ने इस जंग की शुरुआत की? क्या हासिल करना चाहता था पाकिस्तान? आखिर क्यों तत्कालीन पाकिस्तानी सेना प्रमुख मुशर्रफ ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को अपने इस प्लान के बारे में कुछ नहीं बताया? ये ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब आज भी दोनों मुल्क के लोग जानना चाहते हैं।
पाकिस्तानी लेखक करते हैं गुमराह
पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार नजम सेठी कहते हैं कि भारत में इस बारे में बहुत कुछ लिखा गया, जबकि पाकिस्तान में जो भी थोड़ा-बहुत लिखा गया, वह आर्मी के लोगों ने लिखा। लिहाजा, उनका आर्मी प्वाइंट ऑफ व्यू इसमें शामिल है। वरिष्ठ पत्रकार और टीवी एंकर नसीम जाहिरा ने 'कारगिल टू द कूप: 50 डेज दैट शॉक पाकिस्तान' नामक काफी किताब लिखी है।
1984 में पड़ गए थे कारगिल जंग के बीज
कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि कारगिल की जंग यूं ही शुरू नहीं हो गई थी। इसके पीछे 1984 की घटना ने बड़ी भूमिका निभाई थी। राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक (तस्वीर में) का दौर था। भारतीय सेना ने चुपके से सियाचिन पर कब्जा जमा लिया था। दरअसल, सियाचिन लाइन ऑफ कंट्रोल के ऊपर है। यहां पाक फौज सर्दियों में पोस्ट खाली कर देती थी और गर्मियों में वापस आ जाती थी। भारतीय सेना को इसी का फायदा मिला।
भारतीय सेना के इस कारनामे की रिपोर्ट पाक सेना ने जिया को दी। उन्होंने इस खबर को मुल्क में बेइज्जती होने के डर से दबा दिया। इसका सबसे बड़ा कारण ये भी था कि वह चाहकर भी कब्जा छुड़ा नहीं सकते थे। पहाड़ियों की ऊंचाई पर बैठी भारतीय फौज को लड़ाई में फायदा था। सियाचिन हादसे के बाद पाक सेना का एक शीर्ष अधिकारी जिया के सामने एक प्लान लेकर पेश हुआ। इससे जिया की चिंता और बढ़ गई।
पाक सैन्य अधिकारी का प्लान
पाक सेना के उस शीर्ष अधिकारी ने इस प्लान के बारे में बताया कि हम एलओसी से करीब 10 किमी दूर कारगिल पर कब्जा कर लेंगे। जिया ने पूछा, कारगिल ही क्यों? अधिकारी ने बताया कि कारगिल की पहाड़ियों से नेशनल हाईवे दिखता है और यह लेह-लद्दाख को जोड़ता है। इससे होकर सियाचिन की सप्लाई लाइन जाती है। इसे काट कर भारत को झुकाया जा सकता है। फिर सियाचिन वापस करने की मांग पर कब्जा छोड़ेंगे।
जिया को इस बात से चिंता हुई कि क्या यह इतनी आसानी से हो सकेगा। अधिकारी ने बताया कि ये हो सकता है। भारत बड़ा मिलिट्री ऑपरेशन भी छेड़ दे तो उसके लिए भी हमें तैयार रहना होगा। जिया ने अधिकारी को डांट लगाते हुए प्लान ड्रॉप कर दिया। उस दौरान अफगानिस्तान में पाकिस्तान ने एक मोर्चा खोल रखा था और इसलिए जिया उल हक भारत के साथ युद्ध करने के पक्ष में नहीं थे, इसलिए ये आइडिया ड्रॉप किया गया।
पाक मिलिट्री अफसर का प्लान
पाक सेना के उस टॉप अफसर ने इस प्लान के बारे में बताया कि हम एलओसी से करीब 10 किमी दूर कारगिल पर कब्जा कर लेंगे। जिया ने पूछा, कारगिल ही क्यों? अधिकारी ने बताया कि कारगिल की पहाड़ियों से नेशनल हाईवे दिखता है और यह लेह-लद्दाख को जोड़ता है। इससे होकर सियाचिन की सप्लाई लाइन जाती है। इसे काट कर भारत को झुकाया जा सकता है। फिर सियाचिन वापस करने की मांग पर कब्जा छोड़ेंगे।
जिया को इस बात से चिंता हुई कि क्या यह इतनी आसानी से हो सकेगा। अधिकारी ने बताया कि ये हो सकता है। भारत बड़ा मिलिट्री ऑपरेशन भी छेड़ दे तो उसके लिए भी हमें तैयार रहना होगा। जिया ने अधिकारी को डांट लगाते हुए प्लान ड्रॉप कर दिया। उस दौरान अफगानिस्तान में पाकिस्तान ने एक मोर्चा खोल रखा था और इसलिए जिया उल हक भारत के साथ युद्ध करने के पक्ष में नहीं थे, इसलिए ये आइडिया ड्रॉप किया गया।
दिल्ली-लाहौर बस सेवा बनी रोड़ा
अब आता है 1999 का दौर। उस वक्त नवाज शरीफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे। वह अटल बिहारी वाजपेयी के साथ फरवरी में दिल्ली-लाहौर बस सेवा की शुरुआत कर चुके थे। यह बात तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ को पसंद नहीं आई। जानकार बताते हैं कि 1984 के कारगिल प्लान को लेकर में मुशर्रफ ने अक्टूबर 1998 में कब्जे का मंसूबा तैयार कर लिया था। लेकिन नवाज शरीफ की बस डिप्लोमेसी की ललक ने इस पर पानी फेर दिया।
मुजाहिदीनों की शक्ल में आए थे पाक जवान
जर्नलिस्ट नजम सेठी का कहना है कि मुशर्रफ के साथ जनरल अजीज, जनरल महमूद और ब्रिगेडियर जावेद हसन के अलावा किसी को भी इस प्लान के बारे में नहीं पता था। ये चारों पाकिस्तान में गैंग ऑफ फोर के नाम से कुख्यात हैं। इन्होंने मुजाहिदीनों को भेजने के बजाय पाक सेना के जवानों को भेजना मुनासिब समझा। जनवरी में स्कर्दू और गिलगित से सेना के 200 जवानों को सलवार कमीज पहनाकर भेज दिया गया। शुरुआत में सिर्फ 10 भारतीय चौकियों पर कब्जा करने का प्लान था, लेकिन धीरे-धीरे भारतीय सेना की लचर व्यवस्था के कारण मार्च तक 140 पोस्ट पर कब्जा जमा लिया गया।


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