Header Ads

पति से भी परदे में बतियाती थी ये विषकन्या, जानें इससे जुड़े किस्से



राम रहीम के डेरे के सर्च अभियान में विषकन्याओं के होने की बात निकलकर सामने आई है। इन विषकन्याओं के बारे में कहा जा रहा है कि इनका काम मासूम लड़कियों को फंसाकर बाबा के पास लाना होता था, लेकिन असल में इन विषकन्याओं की सच्चाई कुछ और ही है जो भारतीय इतिहास में कहीं दबी है।]


देखा जाए तो विषकन्याएं आज की देन नहीं है बल्कि इनके होने का जिक्र 'कथासरितसागर', 'मुद्राराक्षस' 'कल्किपुराण' जैसे कई ग्रंथों में भी मिलता है। विष कन्या की प्रथा सदियों से चली आ रही है, हालांकि उनका इस्तेमाल हर काल में अलग अलग वजहों से हुआ।


कभी मजबूरी में तो कभी मकसद में, लेकिन इतना तय है कि विषकन्या का कॉन्सेप्ट हमेशा नुकसान पहुंचाने के लिए ही हुआ।




चंद्रगुप्त मौर्य काल (३२१,185 बीसीई )में लिखे गए महाग्रंथ 'मुद्राराक्षस' में विषकन्या का उल्लेख है जिसे राजाओं की आज्ञा पर नगरवधुओं के सानिध्य में तैयार करवाया जाता था।


ये नगरवधुएं दरअसल शाही वेश्या होती थी जो राजाओं के आमोद प्रमोद के साधन जुटाती थी। इनके महलों में सुंदर बच्चियों को विषकन्या बनाने का घटनाक्रम मुद्रा राक्षस में कई जगह दिखा है।


एक जगह चंद्रगुप्त के महामंत्री और मुख्य रणनीतिकार चाणक्य द्वारा लिखित ' कौटिल्य के अर्थशास्त्र' में साफ लिखा है कि चंद्रगुप्त के दुश्मन और तत्कालीन राजा नन्द के महामंत्री अमात्य राक्षस ने छल से


नगरवधू की तरफ से भेजी गई विषकन्या को भेंट के तौर पर चंद्रगुप्त के राज दरबार में पेश किया। चंद्रगुप्त उपहार में उस अप्रतिम सुंदरी को पाकर खुश हो गए, लेकिन तभी चाणक्य ने कहा कि चंद्रगुप्त की बजाय यह उपहार राजा पर्वतक को दिया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने संकट के समय चंद्रगुप्त की मदद की।


उस समय चंद्रगुप्त निराश हो गए और राजा पर्वतक उस सुंदर कन्या को लेकर अपने राज लौट गया।


तीसरे दिन पूरे शरीर में जहर फैलने से राजा पर्वतक की मौत की खबर आई तो चाणक्य ने राज खोला कि अमात्य राक्षस ने उस सुंदरी के भेष में विषकन्या भेजी थी जिसका संसर्ग करते ही चंद्रगुप्त की मौत हो जाती।


सबसे पहली बात दिमाग में आती है कि विषकन्या बनती कैसे होगी। कोई लड़की कैसे इतनी जहरीली बन जाती होगी कि उसके खून या लार तक से इंसान मर जाए।


हिंदू पौराणिक ग्रंथ 'कल्किपुराण' में विषकन्या सुलोचना का जिक्र किया गया है। सुलोचना गंधर्व चित्रग्रीव की पत्नी थी और इसे देखने भर से शत्रु की मौत हो जाती थी। यहां तक कि वो परदे में रहकर ही चित्रग्रीव से बात किया करती थी।


कल्किपुराण कहता है कि उस काल में जब पंडित किसी घर में जन्मी कन्या को विषकन्या योग से पीड़ित बता दिया करते थे तो उस कन्या को घर से अलग करके राज प्रसाद में विषकन्या बनाने के लिए भेज दिया जाता था।

नगरवधुओं की निगरानी में इन खूबसूरत बच्चियों को बेहद थोड़ी थोड़ी मात्रा में जहर दिया जाता था ताकि उनकी मौत न हो जाए और जहर उनके शरीर में मिलता भी रहे।


यौवन आते आते ये लड़कियां विषैली बन जाती थी। यहां तक कि इनके नाखून और दांतों में भी जहर भर जाता था। फिर इन्हें संगीत और नृत्य में प्रवीण बनाया जाता और जासूसी तक सिखाई जाती।


देखा जाए तो यह एक तरह से राजा की खास जासूस होतीं जो मौका मिलते ही दुश्मन को मार देती थी। 'कल्किपुराण' में विषकन्याओं को कांधली भी कहा गया है। कांधली शब्द कंधल के झाड़ से लिया गया है।


कंधल का पौधा यूं तो अपने विलक्षण फूलों को लेकर दुनिया भर में मशहूर है लेकिन इसका कंद और बीज इतने घातक विषैले होते हैं कि इन्हें खाने से व्यक्ति की मौत तक हो सकती है।


उस समय काल में ऐसा मानना था कि विष कन्या योग वाली लड़की की शादी हो गई तो उसका पति तुरंत मर जाएगा। ऐसे में किसी और को मारने की बजाय लड़की को राज्य के हित के लिए भेज दिया जाता था।


विषकन्या बनने के बाद एक युवती इस कदर विषैली हो जाती थी कि अगर सांप भी उसे डंस ले तो सांप की मौत हो जाए। गुप्त और मगध शासनकाल के बाद विषकन्याओं का दौर कम हुआ लेकिन बरकरार रहा।


हालांकि इनके तरीके और मकसद बदल गए।

नए दौर में कई देशों की सेनाओं ने भी गुप्तचरी और दुश्मन को फंसाने के लिए विषकन्याओं का इस्तेमाल किया जाता रहा है। ये हनीट्रेप मिशन के भीतर ही प्रोसेस होता है।


देखा जाए तो सुसाइड महिला दस्ते भी एक तरह से विषकन्याओं का ही विस्तृत कॉन्सेप्ट हैं जिसका मकसद है 'मारो और मर जाओ'। इसके तहत लड़कियां कभी जहरीली लिपस्टिक और नेल पेंट में जहर लगाकर दुश्मन का खात्मा करती हैं तो कभी खुद के शरीर पर बम बांधकर नरसंहार करती हैं।