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बुलेट ट्रेन के पहले भी जापान भारत में बिछा चुका है रेलवे लाइन, ये थी वजह


 जापानी प्रधानमंत्री के भारत दौरे की खबरों के बीच जापान से बस्तर के पुराने रिश्ते की बात भी चर्चाओं में है। भारत में शुरु होने वाली बुलेट ट्रेन के पहले भी जापान ने भारत में रेलवे लाइन बिछाई थी। ये बात अलग है कि लाइन केवल बिजनेस पर्पस से बिछाई गई थी। चीन ने खत्म कर दिया बाजार...

भारत से जापान जा रहे इस पत्थर का निर्यात पिछले तीन वर्षों से बंद हो गया है। खदान संचालक अशोक लूनिया ने बताया कि जापान में इस पत्थर की मांग को अब चीन ने पूरा करना शुरु कर दिया है। चीन काफी कम कीमत पर जापान को पत्थर उपलब्ध करा रहा है।

- विशाखापटनम से बैलाडिला के बीच पहाड़ियों और सुरंगों से होकर गुजरने वाले रेल लाइन का निर्माण भी उन्हीं की इंजीनियरिंग का नमूना है। यहां की बैलाडिला की पहाड़ियों से बेहद उम्दा किस्म का लौह अयस्क दशकों तक जापान भेजा जाता रहा है।


- गुणवत्ता में भारत का पत्थर बेहतर है पर कम दामों के चलते अभी मांग नहीं आ रही है। जापान से मांग नहीं आने के कारण अब स्थानीय बाजार पर ही निर्भर होना पड़ रहा है।


- जहां डेढ़ से दो सौ रुपए प्रति वर्गफुट की दर पर इसे किचन प्लेटफार्म से लेकर घरेलू सज्जा आदि में उपयोग किया जा रहा है।


- खदानों से निकले इस पत्थर को आकार देकर ट्रेलर के जरिये जगदलपुर होते हुए

विशाखापटनम ले जाया जाता था। यहां से समुद्र के रास्ते इन पत्थरों को जापानी बंदरगाह भेजा जाता था।


- खनिज निरीक्षक आदित्य मानकर ने बताया कि गट्‌टीपलना की 3.5 एकड़ जमीन 26 अप्रैल १९९८, से वर्ष 2033 तक के लिए लीज पर विमल लूनिया को दी गई है। एसडीएम खेमलाल वर्मा के मुताबिक खदान की नई लीज पुन: 5 सितंबर 2017 को जारी की गई है इससे शासन को 1500 रुपए प्रति घन मीटर रायल्टी भी मिलती है।



 बस्तर के जापान से लंबे समय से व्यापारिक संबंध रहे हैं। कोंडागांव के फरसगांव तहसील में स्थित है गट्‌टीपलना की खदानों से चमकीले काले रंग का ग्रेनाइट पत्थर निकालकर पिछले 20 सालों से सीधे जापान भेजा जाता रहा है।


- जापानी अपने प्रियजनों की मृत्यु के बाद उनकी स्मृति में भव्य स्मारक बनाते हैं। इसमें 6 फीट लंबा, 6 फीट चौड़ा और १५, से 20 फीट ऊंचाई का एक ही पत्थर का उपयोग किया जाता है।
- जापानी इसका उपयोग अपने प्रियजनों की स्मृति में स्मारक बनाने में करते आए हैं लेकिन अब चीन की दखल के बाद इसका यहां से निर्यात बंद हो गया है। चीन अब इसी तरह के सस्ते पत्थर जापान को उपलब्ध करवा रहा है, जिसमें गुणवत्ता नहीं है।