विदेश से घर लौटे बेटे को घर पर मां नहीं मिली, मिला मां का कंकाल
एक बेटे की ज़िन्दगी उस वक़्त बिखर गई जब वो 1 साल बाद अपने घर लौटा और घर में उसे अपनी मां की लाश मिली.
अमेरिका में काम करने वाले ऋतुराज साहनी रविवार शाम, मुंबई स्थित अपनी मां के घर पहुंचे. बार-बार डोरबेल बजाने पर भी जब किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला, तो ऋतुराज को संदेह हुआ कि कुछ ठीक नहीं है.
एक चाबी बनाने वाले की मदद से दूसरी चाबी बनवाकर, ऋतुराज ने जब फ़्लैट का दरवाज़ा खोला, तो उन्हें अपनी मां की लाश मिली. लाश की स्थिति बहुत खराब थी.
पुलिस के अनुसार 63 वर्षीय आशा साहनी की मृत्यु हफ़्तों पहले हो चुकी थी. लेकिन पोस्टमोर्टम रिपोर्ट से ही मृत्यु के दिन और समय का खुलासा हो सकता है. मृतका के शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं पाए गए, जिससे अटकलें लगाई जा रही हैं कि उसकी मौत प्राकृतिक कारणों से हुई होगी.
ये घटना कई सवाल खड़े करती है.
पहला और सबसे अमानवीय सवाल, आशा के बेटे ने अपनी मां की सुध क्यों नहीं ली? ऋतुराज के अनुसार, उसकी मां से उसकी बात पिछले साल अप्रैल महीने में हुई थी. ऋतुराज ने कहा कि उसकी मां अकेलेपन का शिकार थी और बार-बार वृद्धाश्रम जाने की ज़िद करती थीं.
दूसरा, कोई कामवाली बाई, सफ़ाईकर्मी या राशनवाला कोई भी उस फ़्लैट का दरवाज़ा खटखटाने नहीं गया. 10वें माले पर स्थित दोनों फ़्लैट का मालिक साहनी परिवार ही था, इसीलिये किसी को लाश की बदबू भी नहीं आया.
आशा की मृत्यु हमारे समाज की एक कड़वी हक़ीक़त बयां करती है. माता-पिता का ख्याल बहुत से लोग नहीं रख पाते और इस केस में तो एक मां ख़ुद को वृद्धाश्रम में छोड़ने की मिन्नतें कर रही थी, क्योंकि वो बहुत ज़्यादा अकेला महसूस कर रही थी. किसे पता था कि ये अकेलापन ही उनकी मृत्य की वजह बन जाएगा.
Foundation ने जून में एक Survey करवाया. इस सर्वे में १५०००, वरिष्ठ लोगों से सवाल पूछे गए. इन लोगों में से 47.49% लोगों ने बताया कि वो अकेलेपन के शिकार हैं. 53.53% लोगों ने बताया कि उनके साथ बुरा व्यवहार किया जाता है. 5 में से 1 ने बताया कि उन्हें काउंसलर के पास जाना पड़ा.
ज़्यादातर वरिष्ठ नागरिकों के बच्चे या तो शहरों में बस जाते हैं या विदेशों में. कई बार तो एक घर में रहकर भी परायों से सूलुक करते हैं. बहुत से वृद्ध तो खुद ही वृद्धाश्रम का विकल्प चुनते हैं ताकि उन्हें अकेलेपन का सामना ना करना पड़े.
इस घटना को सोचिये कि आप अपने वृद्ध माता-पिता, दादा-दादी के साथ कैसे पेश आते हैं?

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