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कोई चरवाहा तो कोई था डाकिया, इस तरह बन गए दुनिया के खूंखार तानाशाह


इतिहास ऐसे लोगों से भरा पड़ा है जिन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए जमकर कत्ले-आम मचाया।

इतिहास में ऐसे कई लोग हैं, जिन्होंने सत्ता पाने और शासक बने रहने के लिए न सिर्फ हर तरह के नियम-कायदों को ताक पर रखा बल्कि जमकर कत्लेआम भी मचाया। इन्होंने विरोधियों की आवाज और जनता के अधिकारों को हथियारों के दम पर कुचला। इनके सत्ता में बने रहने की भूख की पूरी दुनिया ने बड़ी कीमत चुकाई। क्योंकि, कई देशों ने इन तानाशाहों की जिद के चलते कई जंग लड़ीं, जिसमें लाखों लोगों की जानें चली गईं। इसी सिलसिले में आज हम आपको दुनिया के कुछ ऐसे ही खूंखार तानाशाहों के बारे में बता रहे हैं।

वियतनाम के स्वतंत्रता संग्राम के लीडर मिन का जन्म फ्रांस में हुआ था। मिन के जन्म के बाद उनकी फैमिली वियतनाम में शिफ्ट हो गई थी। इस समय वियतनाम में फ्रांस का शासन था। मिन की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। बचपन में वे ब्रेड बेचकर जेबखर्च निकाला करते थे। इसी दौरान वे ऐसे नेताओं के संपर्क में आए, जो फ्रेंच सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। मिन प्रभावी वक्ता थे, इस तरह वे स्वतंत्रता संग्राम के लीडर बने। 2 सितंबर, 1945 में मिन के नेतृत्व में देश आजाद हुआ और देश की कमान मिन के हाथों में आ गई। मिन कम्युनिस्ट पार्टी के चीफ थे, जिनके खिलाफ काफी लोग भी थे। बताया जाता है कि मिन ने अपने विरोधियों को कुचलने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए और उनके शासनकाल में करीब 1 लाख लोग मारे गए।

मिन के खिलाफ देश ही में हो रहे विरोध को देखते हुए फ्रांस ने वियतनाम पर दोबारा हमला कर दिया। इसी दौरान जेनेवा समझौता हुआ, जिसके तहत वियतनाम दो हिस्सो में बंट गया साउथ वियतनाम और नॉर्थ वियतनाम। बंटवारा होते ही दोनों देशों के बीच भीषण जंग छिड़ गई। नॉर्थ वियतनाम के साथ कम्युनिस्ट समर्थक देश थे। वहीं, दक्षिण वियतनाम की ओर से कम्युनिस्ट विरोधी अमेरिका और उसके सहयोगी लड़ रहे थे। इसी दौरान 2 सितंबर, 1969 में मिन का निधन हो गया था। युद्ध दिसंबर 1956 से अप्रैल 1975 तक चला था। करीब 20 साल तक चले भीषण युद्ध में किसी की भी जीत नहीं हुई। युद्ध में 30 लाख से ज्यादा लोग मारे गए।

सलोथ सार को पोल पॉट के नाम से भी जाना जाता है। वे कम्बोडियाई साम्यवादी आंदोलन के नेता और 1976 से 1979 के मध्य लोकतांत्रिक कम्पूचिया के प्रधानमंत्री थे। पोल के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने देश में क्राइम और भ्रष्टाचार खत्म करने के नाम पर लाखों लोगों की जान ली। उनके शासनकाल में करीब 20 लाख लोगों को जानें गईं।

1979 में कंबोडिया-वियतनाम युद्ध के दौरान जब पड़ोसी वियतनाम ने कंबोडिया पर हमला किया तो पोल पॉट दक्षिण पश्चिम कंबोडिया के जंगलों में भाग गए और उनकी सरकार का पतन हो गया। 1979 से 1997 के दौरान पोल पॉट अपने वफादार साथियों के साथ सरकारी विरोधी गतिविधियां छिपकर चलाते रहे रहे और आखिरकार दोबारा कंबोडिया के पीएम बने। 1998 में भ्रष्टाचार के आरोप में उन्हें नजरबंद कर दिया गया। इसी दौरान उनकी मौत हो गई। ऐसा भी कहा जाता है कि उन्हें जहर देकर मारा गया था।

कैरेबियन कंट्री हैती के 40वें प्रेसिडेंट फ्रांसिस दुवेलियर पेशे से डॉक्टर थे। इसी दौरान वे डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़े और पार्टी के लीडर बने। कुछ ही समय में वे हैती के इतने प्रभावशाली लीडर बने कि लोग उन्हें ‘पापा डॉक’ के नाम से बुलाने लगे थे।। 14 अप्रैल, 1907 को जन्में दुवेलियर 1957 में देश के प्रेसिडेंट बने 1971 तक देश की बागडोर संभाली। इस दौरान उन्होंने अपने विरोधियों की आवाज को हथियारों की दम पर दबाया। उनके शासनकाल में करीब 60 हजार लोग मारे गए। इन हत्याओं का आरोपी फ्रांसिस को ही माना जाता है। 21 अप्रैल, 1971 में उनका निधन हुआ।

लीबिया के तानाशाह गद्दाफी का जन्म सिरते सिटी के पास एक गांव में 7 जून, 1942 को हुआ था। घुमक्कड़ बद्दू कबीले में जन्मे गद्दाफी बचपन में बकरियां चराया करते थे। गद्दाफी का नाम 1967 में चर्चा में आया, जब अरब-इसराइल युद्ध में अरब जगत की हार हुई। इस बात का नाराजगी लीबिया सहित कई मुस्लिम देशों में थी। इसी दौरान लीबिया ने हथियार उठाए और अपनी सेना खड़ी की।
साल 1969 में जब गद्दाफी ने सैनिक तख्त पलटकर सत्ता हासिल की थी तो मुअम्मर गद्दाफी एक खूबसूरत और करिश्माई युवा फौजी अधिकारी थे। गद्दाफी ने लीबिया में जनता के लिए कई ऐसे काम किए, जिससे उनकी काफी चर्चा होती थी। लेकिन, इसके बाद गद्दाफी का रवैया तानाशाही होता चला गया। गद्दाफी ने अपने विरोधियों को चुन-चुनकर मरवाया। इसके अलावा सैकड़ों लड़कियों का रेप किया। अय्याशी प्रवृत्ति के चलते गद्दाफी के जनता चिढ़ने लगी। पश्चिमी देशों की सैन्य कार्रवाई के बाद 69 वर्षीय तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी की अक्टूबर, 2011 में हत्या कर दी गई थी।

हिटलर का जन्म ऑस्ट्रिया में 20 अप्रैल 1889 को हुआ। जवानी के दिनों में हिटलर डाकिया थे, जो सैनिकों को उनके घरो ंसे आई चिट्ठियां पहुंचाते थे। इसी दौरान वे सैनिकों के संपर्क में आए और आर्मी ज्वाइन की। इसके बाद वे राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन कामगार पार्टी का नेता बने और इस तरह जर्मनी के शासक बने। हिटलर को द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार माना जाता है। उसके आदेश पर नाजी सेना ने पोलैंड पर आक्रमण किया। सेकंड वल्र्ड वॉर में हिटलर ने यूरोप की धरती को यहूदियों के खून से लाल कर दिया था। ऐसा माना जाता है कि जब रूस की रेड आर्मी ने बर्लिन पर आक्रमण किया तो हिटलर ने 30 अप्रैल, 1945 को आत्महत्या कर ली।


हिटलर का जन्म ऑस्ट्रिया में 20 अप्रैल 1889 को हुआ। जवानी के दिनों में हिटलर डाकिया थे, जो सैनिकों को उनके घरो ंसे आई चिट्ठियां पहुंचाते थे। इसी दौरान वे सैनिकों के संपर्क में आए और आर्मी ज्वाइन की। इसके बाद वे राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन कामगार पार्टी का नेता बने और इस तरह जर्मनी के शासक बने। हिटलर को द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार माना जाता है। उसके आदेश पर नाजी सेना ने पोलैंड पर आक्रमण किया। सेकंड वल्र्ड वॉर में हिटलर ने यूरोप की धरती को यहूदियों के खून से लाल कर दिया था। ऐसा माना जाता है कि जब रूस की रेड आर्मी ने बर्लिन पर आक्रमण किया तो हिटलर ने 30 अप्रैल, 1945 को आत्महत्या कर ली।
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कोई चरवाहा तो कोई था डाकिया, इस तरह बन गए दुनिया के खूंखार तानाशाह

ईदी अमीन।
युंगाडा के पूर्व तानाशाह ईदी अमीन ने राष्ट्रपति के तौर पर करीब आठ साल तक राज किया और लोगों पर जमकर जुल्म ढाया। कहते हैं न कि एक न एक दिन बुराई का अंत होता है। इसी तरह करीब 35 साल पहले 11 अप्रैल को ही ईदी अमीन को भी घुटने टेकने पड़े थे। 5 लाख से ज्यादा लोगों की हत्या के दोषी दादा ईदी अमीन को इसी दिन युगांडा छोड़कर भागना पड़ा। इसके दो दिन बाद गठबंधन की पूर्व सरकार ने सत्ता संभाली।

1966 से युगांडा सेना और एयरफोर्स के मुखिया रहे ईदी अमीन ने 1971 में मिल्टन ओबोटे को सत्ता से बेदखल कर यहां की सत्ता अपने कब्जे में ले ली थी। तख्तापलट के एक हफ्ते बाद फरवरी में अमीन ने खुद को युगांडा का राष्ट्रपति सभी सशस्त्र बलों का प्रमुख कमांडर, आर्मी चीफ ऑफ स्टाफ औऱ चीफ ऑफ एयर स्टाफ घोषित कर दिया। इतना ही नहीं, इस तानाशाह और उग्र राष्ट्रवादी ने युगांडा से लांगो और अछोली जातीय समूहों को सफाये के लिए एक जनजातीय नरसंहार कार्यRम शुरू कर दिया। इसके पीछे मकसद साफ था, ओबाटे समर्थकों की सेना का सफाया करना।
अमीन ने 1972 में आदेश दिया कि जिन एशियाई लोगों को पास युगांडा की नागरिकता नहीं है, वो देश छोड़ दें। इसके बाद करीब 60 हजार भारतीयों और पाकिस्तानियों को देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था। देश के कर्मचारियों का एक बड़ा हिस्सा एशियाई लोगों का था। इनके देश छोड़ते ही युगांडा की अर्थव्यवस्था चरमरा गई।

अमीन का तख्तापलट
1979 में जब तंजानिया और अमीन विरोधी युगांडा सेना ने धावा बोला, तब अमीन की आठ साल की तानाशाही का अंत हुआ। हालांकि, इससे पहले अक्टूबर 1978 में अमीन ने तंजानिया पर असफल हमले की कोशिश की थी। अमीन ने देश छोड़ने के बाद कुछ समय लीबिया में शरण ली। फिर वो सऊदी अरब में बस गया, जहां 2003 में उसकी मौत हो गई।

‘मैड मैन ऑफ अफ्रिका’
अमीन को ‘मैड मैन ऑफ अफ्रिका’ भी कहा जाता था और इसके पीछे जायज वजह भी थी। अमीन आमतौर पर लोगों की हत्या के लिए हथियारों की इस्तेमाल नहीं करता था। उसने कुछ को जिंदा जमीन में गड़वा दिया और कुछ बचे लोगों को अपने भूखे मगरमच्छों के खिला दिया। उसने अपने पैलेस की तकरीबन सभी खूबसूरत लड़कियों को अपनी हवस का शिकार बनाया। कहा जाता है कि अमीन इंसानों का मांस खाने का शौकीन था और इसके सबूत भी मिले थे। उसके फ्रिज से बहुत सारे इंसानों के सिर बरामद हुए थे।