साल में एक ही बार होता है इस शिवलिंग का दर्शन, दूर होता है कालसर्प दोष
काशी में 100 फीट की गहराई में एक ऐसा शिवलिंग है, जिसके साल में सिर्फ एक बार नागपंचमी से 7 दिन पहले दिन दर्शन होते हैं। अगले दिन फिर यहां पूरा पानी भर जाता है। ये शिवलिंग शेषनाग के अवतार महर्षि पतंजलि द्वारा स्थापित नागकुआं में मौजूद है। पानी आने का रहस्य आज भी बना है। कूप निर्माण को लेकर बताया जाता है, इसका जीर्णोद्धार संवत 1 में किसी राजा ने करवाया था। इस हिसाब से इसका समयकाल लगभग 2074 साल पुराना है
मंदिर के महंत पंडित तुलसी पांडेय ने बताया, ''महर्षि पतंजलि ने अपने तप के लिए इस कूप का निर्माण करवाया था। इसकी सतह में उनके द्वारा स्थापित एक विशाल शिवलिंग है, जो जमीन तल से 100 फीट नीचे है।''
- ''पूजा और दर्शन साल में एक बार नागपंचमी के 7 दिन पहले कूप की सफाई के दौरान कर पाते हैं। इसके बाद साल भर यह शिवलिंग पानी डूबा रहता है।''
- ''यहीं पर उन्होंने अपने गुरु पाणिनि के साथ कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की, जिसमें महाभाष्य, चरक संहिता, पतंजलि योग दर्शन प्रमुख हैं।
- महर्षि पतंजलि शेषावतार थे, इसलिए वे पर्दे की आड़ से अपने सभी शिष्यों को एक साथ सभी विषय पढ़ाते थे। किसी को भी पर्दा हटाने की परमिशन नहीं थी।''
- ''इस कूप में पानी कहां से आता है यह रहस्य है। अंदर कूप की दीवारों से पानी आता रहता है। सफाई के लिए दो-दो पम्पों का सहारा लेना पड़ता है।''
- ''इसके चारों तरफ सीढ़िया हैं। नीचे कूप के चबूतरे तक पहुंचने के लिए दक्षिण से 40 सीढ़ियां, पश्चिम से 37, उत्तर और पूरब की ओर दीवार से लगी 60-60 सीढ़ियां हैं। इसके आलावा कूप में शिवलिंग तक उतरने लिए 15 सीढ़ियां हैं।''
- ''कूप में दक्षिण दिशा ऊंची है, जिसमें 40 सीढ़ियां हैं, जो प्रमाणित करती है यह कूप पूरी तरह वास्तुविधि से बना है।''
- आचार्य कुंदन पांडेय ने बताया, ''नाग पंचमी पर इस कूप पर श्रद्धालुओं की भीड़ आती है। लोग दूध, लावा और तुलसी की माला से पूजा करते हैं, क्योंकि शेषनाग को तुलसी बहुत प्रिय है।''
आचार्य ने बताया, कालसर्प दोष दूर हो जाता है। अकाल मृत्यु का कारण खत्म हो जाता है।
- राहु और केतु से पीड़ित व्यक्ति को यहां पूजा से काफी लाभ और फायदा मिलता है। यहां के जल को घरों में छिड़कने से सर्पभय नहीं रहता और पूजा से सर्पभय से मुक्ति मिलती है।

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