अब इस हाल में है 29 दिन कोमा में रही 'आशिकी गर्ल', एक्सीडेंट ने बदल दी लाइफ
अनु अग्रवाल की कहानी भी बिलकुल फिल्मी है। 1990 में आई अनु अग्रवाल की फ़िल्म ‘आशिकी’ से सबकी चहेती बन गई थी।
1990 में आई अनु अग्रवाल की फ़िल्म ‘आशिकी’ ने लोगों को प्यार करने का एक नया अंदाज़ सिखाया था। आज भी उस फ़िल्म के गीत चाहे वो ‘मैं दुनिया भुला दूंगा तेरी चाहत में’ हो या ‘धीरे-धीरे से मेरी जिंदगी में आना’, इन्हें सुनते ही हमारे सामने अनु अग्रवाल और राहुल रॉय का चेहरा अपने आप सामने आ जाता है। राहुल रॉय को ‘आशिकी’ के बाद भी आपने 'बिग बॉस' या फ़िल्मी पार्टियों में ज़रूर देखा गया, लेकिन अनु कहीं नहीं दिखी। आखिर अनु कहां हैं, और वे क्या कर रही हैं, वो क्यों हमें पर्दे पर नहीं दिखाई देती? कुछ ऐसे ही सवालों के जवाबों के साथ अनु अग्रवाल ने बात की...
बॉलीवुड में सब अच्छा चल रहा था फिर एकदम से बॉलीवुड क्यों छोड़ दिया?
1996 तक कुछ हिट फिल्में करने के बाद मेरा वर्ल्ड टूर का मन था और मेरी ये बात सुनकर मेरे असिस्टेंट को लगा कि मुझे साइकेट्रिस्ट की जरुरत है। सच में ये वो टाइम था जब प्रोड्यूसर मेरे घर बैग भर कर पैसे ला रहे थे मुझे अपनी फिल्म में काम करवाने के लिए। दरअसल मुझे शुरु से ही लग रहा था कि मैं इस बॉलीवुड टाइप नहीं हूं तो मैंने अपना बांद्रा का घर और अपनी कार बेची और चल पड़ी वर्ल्ड टूर पर। आजकर सब कान्स फिल्म फेस्टिवल की बात करते हैं, मेरे फिल्मी करियर छोड़ने से पहले मुझे याद है कि मैं तब कान्स में अपनी फिल्म ‘द क्लाऊड डोर’ शो केस कर चुकी थी, जब बाकी सब के लिए फ्रांस बहुत दूर था। ‘द क्लाऊड डोर’ में मैने उस वक्त न्यूड सीन किया था, हालांकि ये बात कम लोगों को पता है क्योंकि तब कान्स फेस्टिवल सब जानते नहीं थे।
आगे की स्लाइड्स में देखें अनु अग्रवाल के साथ की खास बातचीत..
सिर्फ योगा की वजह से हूं जिंदा
बॉलीवुड को टाटा कहने के बाद मैंने योगा पर ध्यान दिया। दरअसल में शुरु से ही योग करती थी। 1997 में मैंने उत्तराखंड के आश्रम में योगा सीखा। लेकिन 1999 में मेरा कार एक्सीडेंट हुआ जिसमे मेरी हड्डियां तो टूटी ही पर मेरे दिमाग पर भी चोट लगी। मैं 29 दिन तक कोमा में रही। यहां तक की डॉक्टर ने मेरे पेरेंटस को ये बोल दिया था कि ये कोमा में ही मर जाएगी। लेकिन मैंने हार नहीं मानी और इन सब में योगा ने मेरी सबसे ज्यादा मदद की।
18 साल की उम्र से कर रही हूं सोशल वर्क
अनु बताती हैं कि 18 साल की उम्र में उन्होंने यूनाइटेड नेशन्स के साथ सोशल काम किया है। हाल ही में अनु अपनी आत्मकथा 'अनयूजवल: मेमोइर ऑफ़ ए गर्ल हू केम बैक फ्रॉम डेड' को लेकर दुबारा से चर्चा के केंद्र में आईं थी। यह आत्मकथा उस लड़की है जिसकी ज़िंदगी कई टुकड़ों में बंट गई थी और बाद में उसने खुद ही उन टुकड़ों को एक कहानी की तरह जोड़ा है। फिलहाल अनु अग्रवाल फिलहाल आफ चला रही हैं जिसमें वो मुंबई की झुग्गियों के बच्चों को नि:शुल्क योगा सिखाती हैं।
फिल्मों में आने से पहले कैरियर कैसा चल रहा था और कैसे फिल्मों में एंट्री हुई ?
फिल्मों में आने से पहले मैं मॉडलिंग करती थी और पेरिस जैसी जगहों पर मॉडलिंग कर काफी अच्छा नाम बन चुकी थी। पेरिस में मेरी एक अच्छी फैशन कंपनी से बात हुई थी और कान्ट्रैक्ट के लिए मैं मेरे बांद्रा वाले बंगले से पेरिस जा रही थी। तभी किसी ने डोरबेल बजाई, जब दरवाजा खोला तो सामने कोई अंजान इंसान खड़ा था जिसने बताया की यश चोपड़ा उनसे मिलना चाहते है, पर कमाल की बात ये थी कि मैं उनको जानती तक नहीं थी मुझे लगा कोई दिल्ली का आदमी होगा या पापा का कोई दोस्त होगा। इसलिए मैंने ध्यान नही दिया। इसके साथ ही मेरा मॉडलिंग करियर भी इतना अच्छा चल रहा था कि मैंने कुछ एक्टिंग का सोचा ही नही था। इस वजह से यश चोपड़ा उनसे मिल नही पाए जबकि बाद में करीब 10 दिन की मेहनत के बाद महेश भट्ट ने मुझे अपनी फिल्म के लिए मना लिया।
अनुजा अग्रवाल,अनु अग्रवाल कैसे बन गई?
मैं बचपन से ही पढ़ाई- लिखाई में अच्छी थी और मेरी मम्मी मुझे गुना कहकर बुलाती थी। एक बार स्कूल की एक मीटिंग में प्रिसिंपल ने मेरी मम्मी से मेरा नाम पूछा, इससे पहले मेरी मम्मी मेरा नाम बताती तब तक मैने बोल दिया कि मेरा नाम अनु अग्रवाल है। बस तभी से ये नाम चल पड़ा और फिल्म ‘आशिकी” में भी यही नाम सभी के सामने आया।
ये“हॉलीवुड आ गई”का क्या कनेक्शन है?
गोविंदा मुझे हॉलीवुड गर्ल के नाम से बुलाते थे। जब भी गोविंदा मुझको देखते तो कहते थे कि “हॉलीवुड आ गई”। जिसका कारण था मेरा फैशन स्टेटमेंट, उस वक्त की हीरोइनें अपनी मम्मी के साथ सेट पर आती थी, लेकिन मैं अकेली ही सेट पर आ जाती थी, वो भी कभी फ्राक पहने हुए तो कभी पोनी टेल करके। मैं उस वक्त पर रिप्ड जीन्स पहनती थी जब बॉलीवुड में कोई रिप्ड जीन्स के फैशन को जानता तक नहीं था। रिप्ड जीन्स की वजह से कई बार प्रोड्यूसर सोचते थे कि, “ये कौन है ऐसे फटे हुए कपड़े पहन कर घूम रही है।” इनफैक्ट वो रिप्ड जीन्स मुझे फैमस डिजाइनर जीआरजीयो अरमानी ने गिफ्ट की थी।
हॉलीवुड से थे कई ऑफर
1993 में ऑलिवर स्टोन भारत आए थे और इस दौरान मुझे उनसे मिलने का भी मौका मिला। जब मैं 1994 में लॉस एंजलिस गई तो ऑलिवर ने मुझे डिनर पर बुलाया और उस ही वक्त मैं इंटरनेशनल थिएटर मैनजमेंट कंपनी से मिली जिसके पास सिलवेस्टर स्टेलॉन जैसे क्लाइंट थे। कंपनी ने मुझे हॉलीवुड के कई प्रोजेक्ट के लिए ऑफर किया पर मुझे तो काम करना ही नहीं था। इसलिए मैंने मना कर दिया।
मैं 11 जनवरी 1969 को दिल्ली में पैदा हुई थी। जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की पढ़ाई कर रही थीं, जब महेश भट्ट ने मुझे अपनी आने वाली फ़िल्म ‘आशिकी’ में पहला ब्रेक दिया और जैसा की सब जानते है कि फिल्म सुपरहिट थी तो मुझे और ऑफर आए जिसके बाद मैंने ‘गजब तमाशा’, ‘खलनायिका’, ‘किंग अंकल’, ‘कन्यादान’ और ‘रिटर्न टू ज्वेल थीफ़’ जैसी फिल्में की।


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