यहां पता नहीं चलता लाशें हैं या जिंदा इंसान, इस कारण एेसे पड़ी हैं डेड बॉडीज
दुनिया की सबसे ऊंची चोटी फतेह करने में मुझे 40 दिन का समय लगा। इस दौरान कई परेशानियां उठाना पड़ी। अक्सर टेम्प्रेचर -52 डिग्री रहता था। इसमें चढ़ाई बेहद मुश्किल होती थी। चढ़ते समय एक बार बर्फीला तूफान भी आया, जिसमें मेरे एक हाथ की उंगली भी गल गई। यह कहना है एवरेस्ट फतेह करने वाले मधुसूदन पाटीदार का। उन्होंने 40 दिन की कड़ी मशक्कत के बाद 21 मई को एवरेस्ट की चढ़ाई पूरी की थी।
- मंगलवार को मधुसूदन एवरेस्ट फतेह के बाद पहली बार अपने पैतृक गांव बरवेट पहुंचे थे। उन्होंने बताया कि चढ़ाई के दौरान कई जगह लाशें दिखाई दीं, जो दूर से जिंदा आदमी की तरह लगती थीं।
- मधुसूदन ने बताया उन्होंने चढ़ाई की शुरुआत चीन के डेस्क नाम स्थान से की थी। पहाड़ पर हवाएं 120 किमी प्रति घंटा के रफ्तार से चलती थी। कई बार रुकना पड़ता था। 8 हजार 500 मीटर की चढ़ाई पूरी करने के बाद एक जोरदार तूफान आया, जिसमें मेरे हाथ की एक उंगली गल गई। तब मुझे लगा था कि मैं यहां से बचकर नहीं जा पाऊंगा। लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी और चढ़ाई पूरी की। मधुसूदन ने बताया उनके ग्रुप में शामिल फ्रेंक नामक एक ऑस्ट्रेलियाई नागरिक की मौत भी हो गई थी।
लाश नीचे लाने के 2 से 3 करोड़ रुपए, इसलिए पड़ी हैं ढेरों लाशें
- आठ हज़ार मीटर की हाइट के बाद वाले एरिया को डेड ज़ोन कहा जाता है। वहां आॅक्सीज़न ज़ीरो होती है। इस हाइट के बाद आपको चलते हुए कहीं भी लाश पड़ी हुई मिल सकती है। बैक्टिरिया नहीं होने के कारण लाशें सड़ती भी नहीं। जो जिस पोजिशन में दम तोड़ता है, वैसा ही रह जाता है। उस उंचाई से एक लाश को नीचे लाने में 22 शेरपाओं को हायर करना होता है। 2 से 3 करोड़ रुपए लाश को नीचे लाने में खर्च होते हैं, इसलिए वहां कई लाशें पड़ी मिलती हैं।
ग्रुप में थे सभी विदेशी, नहीं मिलता था इंडियन खाना
- जिस ग्रुप में शामिल होकर मधुसूदन एवरेस्ट की चढ़ाई कर रहे थे, उसमें सभी विदेशी थे। इसलिए उसे भारतीय खाना नहीं मिल पाया। वे लोग ज्यादातर नॉनवेज खाते थे। मधुसूदन ने बताया उसने जैसे-तैसे ड्रायफ्रूट और अन्य विदेशी खाना खाकर अपनी यात्रा पूरी की।
छूटे टेंट और लाशें आईं नजर
- उन्होंने बताया कि सात हजार मीटर हाइट के बाद ना आॅक्सीजन था और ना वेजिटेशन का कोई सहायता। हम ऊपर बढ़ते जा रहे थे। यहां शरीर को चीरती हवाएं और यहां छूटे पड़े टेंट और उनमें लाशें दिखाई दे रही थीं। आठ हज़ार फीट की ऊंचाई पर जब मैं दूर से दिख रहे एक टेंट मेें मदद की तलाश में गया तो दो लोग बैठे हुए दिखाई दिए। मैंने पूछा तो वे कुछ बोले नहीं। पास जाकर उन्हें हिलाने ही वाला था कि मेरा शेरपा बोल पड़ा हाथ मत लगाओ, ये डेड बाॅडीज़ हैं। वो दृश्य मेरे लिए हिला देने वाला था।
30 लाख हुए खर्च, सरकार से नहीं मिली मदद
- एवरेस्ट पर चढ़कर देश का प्रतिनिधित्व करने वाले मधुसूदन ने अपनी इस यात्रा पर करीब 30 लाख रुपए खर्च किए। उसने बताया भारत सरकार की तरफ से अब तक उसे कोई मदद नहीं मिली है। जबकि यात्रा के लिए उसके परिवार ने सब कुछ दांव पर लगा दिया। हालांकि मधुसूदन को अब भी उम्मीद है कि सरकार उसकी मदद जरूर करेगी।


Post a Comment