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एक ही द‌िन में व‌िधवा हो जाती हैं क‌िन्नरें, ज‌ान‌िए इनके जीवन की ऐसी ही 10 चौंकाने वाली बातें












भारत में प्राचीनकाल से समाज के अन्य वर्गों के साथ ही किन्नरों का उल्लेख मिलता रहा है। समाज में इस वर्ग को हमेशा ही अगल नजरिए से देखा जाता रहा है। लोग किन्नरों के बारे में कई तरह की बातें करते हैं लेकिन हम में से बहुत कम लोग हैं जो इनके बारे में जानते हैं। अपनी इस स्टोरी में हम आपको किन्नरों की जिंदगी के कुछ ऐसे ही अनछुए पहलू के बारे में बताने जा रहे हैं।
धूमधाम से होता है नए किन्नरों का स्वागत
किन्नर समाज में आने वाले हर नए किन्नरों का स्वागत बहुत ही जोरदार तरीके से होता है। नए ‌क‌िन्नर के स्वागत में एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन ‌होता है ज‌िसमें नाच-गाने के अलावा दावत भी होती है।
एक ‌द‌िन के ल‌िए होती है क‌िन्नरों की शादी
किन्नरों की शादी साल में एक बार होती है और वो भी स‌िर्फ एक द‌िन के ल‌िए। इनकी शादी अन्य क‌िन्नर से नहीं बल्क‌ि भगवान अरावन से होती है। शादी के द‌िन भगवान अरावन की मूर्त‌ि लेकर क‌िन्नर शहर में घूमते हैं। अगले ही दिन किन्नर श्रृंगार उतारकर विधवा की तरह शोक मनाते हैं और सफेद कपड़े पहन लेते हैं।
18 द‌िन का वार्ष‌िक समारोह 
साल में एक बार ‌क‌िन्नर अपना 18 द‌िन का वार्ष‌िक समारोह मनाते हैं। यह समारोह चेन्नई से 200 मील दूर कूवगम गांव में मनाया जाता है। यहां पूरे भारत से किन्नर इकट्ठे होते हैं। बता दें क‌ि यह वार्ष‌िक उत्सव तमिल नव वर्ष की पहली पूर्णिमा से शुरु होता है और 18 दिनों तक चलता है। 17वें दिन किन्नरों के देवता भगवान अरावन की पूजा होती है। 18वें दिन सारे कूवगम गांव में अरावन की प्रतिमा को घुमाया जाता है और फिर तोड़ दिया जाता है। उसके बाद दुल्हन बने किन्नर अपना मंगलसूत्र तोड़ देते हैं।
ऐेसे होता है अंतिम संस्कार
हम में से बहुत कम लोग जानते होंगे क‌ि क‌िन्नरों का अंत‌िम संस्कार कैसे होता है। क‌िन्नरों की शव यात्रा रात में ही निकाली जाती है। इसे देखने की इजाजत किसी गैर-किन्नर को नहीं होती। इसकी पीछे मान्यता है क‌ि अगर कोई गैर-किन्नर देख लेेगा तो मरने वाला अगले जन्म में भी किन्नर ही पैदा होगा। 
हर किन्नर के होते हैं गुरु
आपको यह बता दें क‌ि हर किन्नर का अपना एक गुरु होता है। द‌िलचस्प ये है क‌ि उनके गुरु को यह तक पता होता है कि उसके शिष्य की मौत कब होगी। गुरु वही बनता है जो जन्म से ही किन्नर हो। उसे गुरु नहीं बनाया जाता जाे किसी ऑपरेशन के बाद किन्नर बनाया गया हो।
क‌िन्नर करते हैं ह‌िंदू परम्परा का पालन, ज्यादातर गुरु होते हैं मुस्लिम
किन्नर अपनी ज्यादातर परम्पराएं हिन्दू धर्म के अनुसार निभाते हैं जबक‌ि ज्यादातर किन्नर गुरु मुस्लिम होते हैं। 
क‌िन्नरों को मानते हैं ब्रह्मा जी की परछाईं 
एक मान्यता के अनुसार, किन्नरों का जन्म ब्रह्मा जी की परछाई से ही हुआ है। जबक‌ि दूसरी मान्यता यह है कि अरिष्टा और कश्यप ऋषि से किन्नरों की उत्पति हुई है।
कोई क‌िन्नर अगले जन्म में क‌िन्नर नहीं बनना चाहता
इसके ल‌िए किन्नर बहुचरा माता की पूजा करते हैं और उनसे माफी मांगते हैं। वो ये दुआ करते हैं कि अगले जन्म में उन्हें किन्नर का जन्म ना लेना पड़े। क‌िन्नरों ने लड़ी हैं जंग
क‌िन्नरों के बारे में यह बहुत मशहूर है क‌ि वो मुगलों के जमाने में बेगमों के हरम की हिफाजत करते थे। इतिहास में कुछ किन्नरों के जंग लड़ने का भी जिक्र है। इनमें से एक थे मलिक कफूर। उन्होंने दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के लिए दक्कन में जंग जीती थी। होती है खास भाषा
इनके सामाजिक स्टेटस के कारण किन्नरों ने एक खास गुप्त भाषा विकसित कर ली है ज‌िसे ह‌िजरा फारसी कहते हैं।