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बेटे की याद में रोजाना 5 साल से 100 से ज्यादा बेसहारा बुजुर्गों का पेट भर रहा है ये दंपति...


लोगों की जिंदगी में बहुत सी ऐसी घटनाएं घटती जो उनकी दुनिया ही बदल देती हैं। कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जिनसे उबरना बहुत मुश्किल होता है।

कुछ ऐसा ही हुआ था इस दंपति के साथ जिसने उन्हें लोगों के लिए प्रेरणा बनने पर मजबूर कर दिया। मुंबई में रहने वाले दंपति प्रदीप तन्ना और उनकी पत्नी दमयंती पिछले पांच सालों से मुफ्त भोजन की सेवा प्रदान कर रहे हैं।

 ये मुफ्त भोजन सभी के लिए नहीं बल्कि उन बेसहारा बुजुर्गों के लिए है जो सड़कों पर छोड़ दिए गए हैं।

 ये परिवार इन सीनीयर सिटीजन्स के लिए मुफ्त टिफिन सेवा चला रहा है और ये सब वे अपने बेटे की याद में कर रहे हैं जो 2011 में एक ट्रेन दुर्घटना में हमेशा के लिए उनको छोड़कर चला गया था।

बेटे की मौत से सदमें में आए मां-बाप ने जैसे-तैसे खुद को संभाला और कुछ करने की ठानी। उन्होंने अपने बेटे की याद में वो किया जो हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा बन सकता है जिसे जिंदगी में वाकई में कुछ करना है

लेकिन लक्ष्य निर्धारित नहीं है। प्रदीप तन्ना ने अपने बेटे के नाम पर एक ट्रस्ट बनाया गया। आज ये ट्रस्ट उसकी याद में टिफिन सेवा के माध्यम से हर दिन 100 से ज्यादा वरिष्ठ नागरिकों को उनके इलाके में मुफ्त भोजन देता है।

2011 में निमेश तन्ना मुंबई में ही एक मीटिंग में हिस्सा लेने के लिए लोकल ट्रेन पर चढ़े। लेकिन वो कभी उस मीटिंग को अटेंड नहीं कर पाए जिसके लिए वे घर से निकले थे।

निमेश का सिर बाहर निकला हुआ था। ट्रेन तेज रफ्तार से चल रही थी कि तभी अचानक निमेश का सिर एक पोल से जोर से टकराया और निमेश वहीं गर गया।

उनकी मौके पर ही मृत्यु हो गई। तन्ना परिवार को उनके इकलौते बच्चे की मौत ने झकझोर कर रख दिया था।

लेकिन उन्होंने अपने बेटे की मौत को जाया नहीं जाने दिया और वो किया जिसकी लोग मिसाल देते हैं। परिवार ने बेहद असाधारण तरीके से अपने बेटे को श्रद्धांजलि अर्पित करने का फैसला किया।

उन्होंने जरूरतमंदों को मुफ्त भोजन प्रदान करने के लक्ष्य के साथ श्री निमेश तन्ना चैरिटेबल ट्रस्ट (एसएनटीसीटी) शुरू किया।

इस ट्रस्ट को 26 जनवरी 2013 को पंजीकृत किया गया। एसएनटीसीटी ने स्वयं की रसोई से 30 लोगों के लिए मुफ्त भोजन प्रदान करके एक विनम्र शुरुआत की।

 मौजूदा समय में एसएनटीसीटी 100 से ज्यादा लोगों को मुफ्त भोजन प्रदान कर रहा है। खास बात ये है

 कि ये लोग पिछले दो सालों से बिना एक दिन मिस किए बेसहारा लोगों को भोजन दे रहे हैं। मुलुंड में उनके घर में एक नई रसोई है जहां सात कर्मचारी बेसहाराओं के लिए स्वस्थ भोजन तैयार करते हैं।