छठ में पूजा के नाम पर कई लोग ऐसा पाप करते हैं कि भगवान भी रो देते होंगे!
कहते हैं कि भक्त की पूजा भगवान को लगती है. तभी तो लोग भगवान की मूर्ति के आगे धूप-अगरबत्ती जलाते हैं. फूल चढ़ाते हैं. मिठाइयों का भोग लगाते हैं. वो भी ‘ए राम, छी छी’ वाला माल नहीं. एकदम टंच. इतना जतन इसलिए कि भक्त सोचता है, भगवान तक पहुंचेगा. क्या पता, शायद पहुंचता भी हो. आज दिल कर रहा है कि ये शायद उठाकर बाहर फेंक दूं. मान लूं कि भक्त का दिया पक्का भगवान तक पहुंचता है. फिर चाहे वो घी की मिठाइयां हों. या नाले का गंदा पानी. मुंह बनाने की जरूरत नहीं. मैंने अपनी आंखों से कई ऐसे भक्त देखे हैं. जो भगवान को गंदे नाले की सैर कराते हैं. वो भी पूजा-पाठ के नाम पर. अभी छठ आने वाला है. देखिएगा आप. त्योहार के नाम पर खूब पाप होगा.
शहरों में रहने वाले लोगों के लिए साफ नदी-तालाब तो एक सपने जैसा ही है. मजबूरियां हैं, लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि इंसान गंदे नाले में डुबकी लगाकर त्योहार मनाए
हमारा दफ्तर नोएडा में है. नोएडा के फिल्म सिटी में. एकदम दिल्ली की सरहद से सटा हुआ. एक सड़क है उधर. अशोक नगर में. वहां दिल्ली शुरू होता है. नोएडा खत्म होता है. इसी अशोक नगर की कहानी है. वहां एक नाला है. इस नाले के पीछे सपना तो नहर का ही था. वो अलग बात है कि लोगों ने और शहर ने नहर को नाला बना दिया. खूब बड़ा सा है. मस्त गंदा. बदबूदार. भांति-भांति की गंदगी से भरा. उधर से गुजरेंगे, तो मन पक्का भिनक जाएगा. आप गंदगी का नाम लीजिए. पक्की बात है कि अशोक नगर के उस नाले में वो गंदगी पक्का मौजूद होगी. अभी कुछ दिनों से सूखा है. वरना पहले वहां मस्त काला गंदा पानी बहता रहता है. कई बार तो लाशें भी निकलती वहां. लोग मारकर फेंक जाते थे. कभी बोरी में बंद, तो कभी यूं ही. यहां से थोड़ी दूर पर गाजीपुर है. वहां पर एक मंडी है. मच्छी बाजार, मुर्गी बाजार, खस्सी बाजार, सब है वहां. वहां की जो गंदगी होती है, वो भी कई बार इसी नहर में शरण पाती है.
ये ही है वो अशोक नगर का नाला जिसकी हम बात कर रहे हैं. ये अकेला नाला नहीं, जहां लोग छठ मनाते हों. नदी और तालाब पर जाकर छठ पर्व मनाने की परंपरा को मजबूरी का नाम देकर लोग इन गंदे नालों में उतरते हैं और अपनी सेहत से खिलवाड़ करते हैं.
इसी नाले में आजकल खूब चहल-पहल है. घर जाते समय ऑटो वहीं से होकर गुजरता है. दिखता है सब. पास की दीवारों पर चूना पोता जा रहा है. बांस की बल्लियां गड़ रही हैं. लाइट-वाइट लगाने की तैयारी है. ये सब छठ के उपलक्ष्य में हो रहा है. पिछले कई सालों से इस नाले का सामूहिक रोल तय हो रखा है. छठ में काम लाया जाता है. लोग आते हैं. छठ करने. यहीं देखा था मैंने पिछले साल. एक भयंकर पाप को घटते हुए. दिल में ऐसी हूक उठी थी कि पूछिए मत. भगवान के बारे में सोचकर दिल रो दिया था मेरा. कई औरतें देखी मैंने. नाले के पानी में डुबकी लगा रही थीं. पूरी श्रद्धा से. ऐसे जैसे हर की पौड़ी पर गंगा स्नान कर रही हों. कुछ तो ऐसी भी दिखीं, जो उसी नाले के पानी से आचमन कर रही थी. चुल्लू में पानी लिया और मुंह में धरकर कुल्ला कर लिया. उसको देखकर मेरा ऐसा मन घिनाया कि क्या बताऊं.
अब तो छोटे शहरों में भी ये चलन काफी जोर पकड़ रहा है. लोग अपने घरों में छोटा सा गड्ढा खोदकर उसमें पानी भर देते हैं और वहीं छठ करते हैं
यार, ये कैसी अंधभक्ति है. ऐसा करने से किसी को पुण्य कैसे मिल सकता है? सर्टिफाइड पापी हुआ वो तो. इतनी गंदगी में, जहां कोई भला आदमी पैर का अंगूठा न डाले, वहां डुबकी लगा रही हो? जिसके बगल वाली सड़क से गुजरने पर मैं भर मुंह थूक फेंकती हूं, उसका पानी मुंह में भर रही हो? ये तो सरासर पाप है. बेचारे भगवान का क्या होता होगा! ऐसे भक्तों से तो उसका दम घुटता होगा. उसी नाले के पानी से प्रसाद की टोकरी को सटाते हैं लोग. ऐसा गंदा भोग पाकर तो भगवान को मन मिचली आती होगी. उल्टी आती होगी उनको. ये टॉर्चर है. भगवान पर भी और अपने ऊपर भी. इस गंदगी में जाओगे और बीमार होगे. कोई सुपरमैन टाइप इंसान हो, वो ही बच पाएगा. इतनी गंदगी में खाने-पीने की चीजें रखोगे. उससे परिवार और दोस्त भी बीमार होंगे. इससे भगवान खुश नहीं होगा. नाराज होगा. कहता होगा, चूल्हे में जाए ऐसी भक्ति. इतना दिमाग भी नहीं कि सफाई का ध्यान रख लें.
पूजा और भक्ति के नाम पर कॉमन सेंस को तिलांजलि दे देना शाबाशी का काम कतई नहीं है. आस्तिकता और मूर्खता में बहुत अंतर होता है
कहते हैं कि साफ-सफाई से ईश्वर खुश होता है. तभी तो पूजा-पाठ की जगह को पवित्र रखते हैं. खुद भी नहा-धोकर पूजा करते हैं. साफ-सुथरे तरीके से प्रसाद बनाते हैं. गंदगी देखकर तो भगवान भी भाग खड़े होते होंगे. माना कि दुनिया में प्रदूषण बहुत बढ़ गया है. साफ नदी-तालाब मिलते नहीं हैं. ये हमारे समय की मजबूरी है. गंदगी किसी को पसंद नहीं. मजबूरी है कि इसके साथ ही जीना पड़ रहा है. हवा गंदी है. पानी गंदा है. खाने की चीजें जहरीली हो गई हैं. मिट्टी जहरीली हो गई है. इन चीजों के बिना निभ नहीं सकती. सांस लेना ही है. पानी पीना ही है. खाना भी खाना ही है. कम से कम जिन जगहों पर किनारे से बचकर चल सकते हैं, वहां तो थोड़ा परहेज करें.
सवाल आस्था, धर्म और विश्वास का नहीं है. सवाल लोगों की सेहत का है. अंधश्रद्धा के नाम पर ऐसे महागंदे नाले में उतरना मूर्खता है.
सही बात है कि सरकार को सफाई करानी चाहिए. पर सरकार क्या करती है और कितना करती है, ये हम सब जानते हैं. गंगा और यमुना जाने कितने सालों से साफ हो रही हैं. इतना पैसा खर्च हुआ, तब भी साफ नहीं हुईं. और गंदी होती जा रही हैं. ऐसे माहौल मे

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