तोप के गोले तय करते थे राजाओं की हैसियत, ऐसे तय होता था इनका रुतबा
अंग्रेजी शासनकाल में राजा-महाराजाओं की हैसियत तोप के गोले तय करते थे। इसके लिए ब्रितानी सरकार ने बकायदा नियम बना रखे थे कि किस रियासत के किस राजा को कितनी तोपों की सलामी दी जाएगी। जो राजा अंग्रेज हुकूमत में जैसी पैठ रखता था उसको वैसी सलामी दे दी जाती थी। ऐसे हुई थी शुरुआत...
तोपों की सलामी की शुरुआत कब और किसने की यह तो ठीक-ठीक कह पाना मुश्किल है लेकिन इसकी शुरुआत संभवत: चौदहवीं शताब्दी में हुई जब तोपों का इस्तेमाल होने लगा। उस समय नौसेना की प्रथा के अनुसार, हारी हुई सेना से, अपना गोला-बारूद खाली करने की मांग की जाती थी जिससे वह उसका फिर इस्तेमाल न कर सके।
-जहाजों पर सात तोपें हुआ करती थीं क्योंकि सात की संख्या को शुभ माना जाता है और समुद्र के मुक़ाबले धरती पर ज़्यादा बारूद रखा जा सकता था इसलिए जहाज़ की एक तोप के जवाब में किनारे से तीन तोपें दागी जाती थीं। और सात गुणा तीन हुआ 21, इस तरह 21 तोपों की सलामी की शुरुआत हुई।
- तोपों की सलामी देश का सर्वोच्च सम्मान समझा जाने लगा। किसे कितनी तोपों की सलामी दी जाएगी इसका भी एक नियम था। मसलन, ब्रिटिश सम्राट को 101 तोपों की सलामी दी जाती थी जबकि अन्य राजाओं को 21 या 31 की, लेकिन फिर ब्रिटेन ने तय किया कि अंतरराष्ट्रीय सलामी 21 तोपों की ही होनी चाहिए। अमरीका में भी 21 तोपों की सलामी की प्रथा है।
वर्ष 1857 में हुई पहली क्रांति के पश्चात अंग्रेजों को राजा-महाराजाओं और इनकी रियासतों का प्रभाव समझ में आ गया था। इसके बाद महारानी विक्टोरिया ने वर्ष १८५८, से भारत के राजा महाराजाओं को तोप से सलामी देने का आदेश जारी किया। सलामी के दौरान दागी जाने वाली तोपों की संख्या स्थानीय स्तर पर तय की जाती।
अंग्रेज सरकार विभिन्न रियासतों के लिए तोपों की संख्या का निर्धारण राजाओं की हैसियत, राज्य का आकार, जनसंख्या और राजस्व के आधार पर नहीं किया जाता था। बल्कि तोपों से सलामी की हैसियत अंग्रेज सरकार के साथ राजाओं के आपसी सम्बन्धों पर निर्भर करती थी। इस कारण समय-समय पर अंग्रेज तोपों की सलामी की संख्या में फेरबदल करते रहते थे।
इन पांच रियासतों को मिलती थी 21 तोपों की सलामी
- अंग्रेजों के शासनकाल में देश की सिर्फ पांच रियासतों को 21 तोपों को सलामी दी जाती थी। ये सम्मान सिर्फ हैदराबाद, मैसूर, जम्मू और काश्मीर, बड़ौदा और ग्वालियर को हासिल था।
- इसी तरह भोपाल, इन्दौर, उदयपुर, कोल्हापुर, ट्रावणकोर और कालट को 19 तोपों की सलामी का सम्मान प्रदान किया गया था। इनमें से भोपाल, इन्दौर व उदयपुर स्थानीय स्तर पर 21 तोपों की सलामी ले सकते थे।
राजस्थान की 19 रियासतों को अंग्रेजों ने तोपों की सलामी का अधिकार प्रदान किया। इन रियासतों में से सबसे अधिक 19 तोपों की सलामी उदयपुर के महाराणा को दी जाती थी।
- जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, भरतपुर, बूंदी, करौली व कोटा के महाराजा और टोंक के नबाव को 17 तोप की सलामी दी जाती थी। इनमें से जोधपुर और जयपुर स्थानीय स्तर पर 19 तोप की सलामी ले सकते थे।
- अलवर, बांसवाड़ा, धौलपुर, डूंगरपुर, जैसलमेर, किशनगढ़, प्रतापगढ़ और सिरोही के शासकों को तेरह तोप की सलामी दी जाती थी।
- गणतंत्र दिवस की परेड के दौरान राष्ट्रपति को 21 तोपों की सलामी दिए जाने की प्रथा है। दरअसल 21 तोपों की यह सलामी 21 बंदूकों से नहीं, बल्कि भारतीय सेना की 7 तोपों (जिन्हें 25 पाउंडर्स कहा जाता है) से दी जाती है। जैसे ही राष्ट्रपति के बॉडीगार्ड के सीओ राष्ट्रपति को सलामी देते हैं, उसी समय ये तोपें फायर की जाती हैं। राष्ट्रगान शुरू होते ही पहली सलामी दी जाती है और ठीक 52 सेकंड बाद आखिरी सलामी दी जाती है। ये तोपें 1941 में बनी थीं, और आर्मी के हर समारोह में इनका प्रयोग किया जाता है।

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