मन्नतों के बाद पैदा हुए थे शोएब अख्तर, मौत के जबड़े से छीन लाई थीं मां
पाकिस्तान के दिग्गज बॉलर शोएब अख्तर आज 42 साल (13 अगस्त, 1975) के हो गए हैं
रावलपिंडी एक्सप्रेस के नाम से मशहूर शोएब अख्तर का नाम आज भी क्रिकेट की दुनिया के सबसे तेज गेंदबाज के रूप में जाना जाता है. शोएब के नाम ही क्रिकेट इतिहास की सबसे तेज गेंद फेंकने का रिकॉर्ड है. शोएब अख्तर सिर्फ पाकिस्तान में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के बेहतरीन तेज गेंदबाजों में से एक रह चुके हैं.
उनकी गेंद की तेज रफ्तार से बड़े से बड़े बल्लेबाज कतराते थे. उनकी गेंद से कई बल्लेबाज भी चोटिल हो चुके हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि शोएब अख्तर का जन्म कितनी मन्नतों के बाद हुआ था और किस तरह उनकी मां उन्हें मौत के मुंह से खींच कर वापस लाई थी.
पाकिस्तान के दिग्गज बॉलर शोएब अख्तर आज 42 साल (13 अगस्त, 1975) के हो गए हैं. दुनिया के सबसे तेज फास्ट बॉलर्स में से एक शोएब का बचपन बेहद गरीबी में बीता, लेकिन आज वो करोड़ों के मालिक हैं.
क्रिकेट फील्ड से दूर होने के बाद भी वो कभी बतौर क्रिकेट एक्सपर्ट तो कभी टीवी होस्ट के रूप में फैन्स को एंटरटेन कर रहे हैं.
बता दें कि काफी वक्त पहले पूर्व पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब अख्तर ने सोशल मीडिया पर अपने घुटने का एक एक्सरे शेयर किया था. इस एक्सरे रिपोर्ट को शेयर करते हुए उन्होंने लिखा था-
‘एक बच्चा जो 6 साल की उम्र तक ठीक से चल तक नहीं पाता था, वो आगे चलकर क्रिकेट इतिहास में सबसे तेज बॉलर बन गया. इसलिए सपने देखना कभी मत छोड़िए.’
अपनी ऑटोबायोग्राफी में शोएब ने अपने बचपन के कठिन समय का जिक्र किया है. उन्होंने किताब में बताया है कि बचपन में उनके पैर के तलवे फ्लैट थे. इस वजह से शुरुआत में चलना तो दूर वो ठीक से खड़े भी नहीं हो पाते थे. करीब 6 साल तक उन्हें चलने में बहुत दिक्कत आती थी.
इसी दौरान 3 साल की उम्र में उन्हें काली खांसी की बीमारी भी हो गई थी. कई लोग कह चुके थे कि ये लड़का कभी ठीक नहीं होगा, लेकिन शोएब की मां ने हिम्मत नहीं हारी. डॉक्टर्स ने कहा था कि शोएब के फेंफड़े हमेशा के लिए कमजोर हो चुके हैं.
बीमारी के कारण फेंफड़ों का साइज बढ़ गया है. इसके चलते उनमें दूसरे बच्चों के मुकाबले ज्यादा एनर्जी रहती थी. इसी एनर्जी को शोएब ने अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया.
तीन साल की उम्र में शोएब अख्तर को काली खांसी नाम की बीमारी हो गई थी. काफी इलाज कराने के बाद जब वो ठीक नहीं हो रहे थे,
तब शोएब के नाना ने उनकी मां से कहा था कि इस लड़के के इलाज में पैसा बर्बाद मत करो. इससे अच्छा है कि ये पैसा जनाजे के लिए जोड़ लो. हालांकि, शोएब की मां ने हार नहीं मानी और उन्हें मौत के मुंह से वापस खींच लाई थीं.
शोएब अख्तर माता-पिता की पांचवीं संतान हैं. उनसे ठीक बड़े यानी चौथे नंबर के भाई का नाम भी शोएब था. लेकिन 2 साल का होने से पहले ही बीमारी के कारण उसकी मौत हो गई. शोएब की मां को ये नाम बहुत पसंद था,
इसलिए जब वो पैदा हुए तो उनका नाम भी शोएब रख दिया गया.
शोएब के पिता एक ऑयल रिफायनरी में नाइट वॉचमैन थे. माता-पिता और चार बच्चों की फैमिली एक कमरे के आधे कच्चे मकान में रहती थी. एक बार तेज बारिश के कारण घर की छत गिर गई थी. तब पूरी रात परिवार ने किसी तरह खुद को बारिश से बचाया था
और अगले दिन सभी ने मिलकर छत की मरम्मत की थी. इस किस्से का जिक्र शोएब ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में किया. उनके अनुसार, तब वो काफी छोटे थे और उन्हें इस काम के दौरान घर से बाहर बैठा दिया गया था.
शोएब के तीन बड़े भाई हैं. सबसे बड़े भाई का नाम आफरीदी है. उनके चौथे नंबर के भाई की डेथ बीमारी के कारण हो गई थी. इसके बाद शोएब का जन्म हुआ था. उनकी एक छोटी बहन भी है. जो शोएब के 11 साल बाद पैदा हुई थी. बचपन में शोएब बहुत शरारती थे
. स्कूल से अकसर उनकी शिकायत आती थी. शोएब वहां लड़कियों की चोटी तक खींच दिया करते थे. इस वजह से घर पर ही उन्हें खूब डांट पड़ती थी.
कभी शोएब अख्तर के पास जूस पीने तक के पैसे नहीं होते थे. टीवी होस्ट गौरव कपूर के एक क्रिकेट शो ‘ब्रेकफास्ट विथ चैम्पियंस’ को दिए इंटरव्यू में उन्होंने इस किस्से और अपनी स्टार बनने से पहले की लाइफ से जुड़े कई मजेदार किस्से शेयर किए. शोएब के अनुसार वो रावलपिंडी क्लब से जब क्रिकेट प्रैक्टिस कर बाहर निकलते थे
, तो वहां एक गन्ने के जूस वाला था. उससे शोएब ने दोस्ती की. उससे कहा, ‘तू मुझे 50 पैसे का गन्ने का जूस फ्री पिलाएगा और पैसे नहीं लेगा, तो जब मैं स्टार बन जाऊंगा तो तुझे मशीन लगवा दूंगा. तब वो जूस वाला कहता था कि चल आगे. दिमाग खराब है तेरा.‘
शोएब रोज उसकी दुकान पर जाकर यही कहते थे. एक दिन जूस वाले ने पूछा, पक्का है ना कि तू क्रिकेटर बन जाएगा. फिर उसने शोएब को जूस पिलाना शुरू किया. साल डेढ़ साल तक उसने फ्री में उन्हें जूस पिलाया. शोएब के अनुसार, ‘जब मैं स्टार बनकर लौटा तो पचा चला कि उसकी डेथ हो चुकी है.
तब तय किया कि उसकी फैमिली के लिए जरूर कुछ करना है. फिर मैंने सोचा कि अब ये गन्ने का जूस नहीं बेचेंगे. मैं उन्हें दुकान खुलवाकर दी.

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