1400 KM दूर खोए बेटे के मिलने की कहानी, पिता बोले रु. नहीं कैसे लाऊं
करीब दो साल पहले गुम हुआ एक मंदबुद्धि लड़का आधार कार्ड की वजह से बेंगलुरू मिल गया है। 1400 किमी दूर बेंगलुरू के एक अनाथालय में 20 वर्षीय मंदबुद्धि बेटे के मिलने की जानकारी के बाद पिता के आंखों से खुशी के आंसू छलक आए। ये खुशी कुछ देर बात खत्म हो गई। पिता ने बताया कि उनके पास इतने रुपए नहीं है कि वे बेटे को लेकर आ सकें। इंदौर कलेक्टर ने रेडक्रॉस सोसायटी से परिजनों को मदद दिलवाई। कैसे मिला दो साल से गुमा लड़का
- दरअसल, बेंगलुरू के एक अनाथालय में चार दिन पहले आधार कार्ड बनाने का कैंप लगाया गया था। जब एक 20 वर्षीय मंदबुद्धि युवक को मशीन के सामने बैठाकर उसके फिंगर प्रिंट लिए गए और रेटिना को स्कैन किया गया तो साॅफ्टवेयर ने उसका आधार कार्ड बनाना रोक दिया।
- जांच की गई तो पता चला कि युवक का आधार कार्ड पहले से ही बना हुआ है और वह इंदौर में निरंजनपुर का रहने वाला है। इस पर अनाथालय ने भोपाल बात कर इंदौर जिला प्रशासन से संपर्क किया।
- जिला प्रशासन ने निरंजनपुर जाकर परिजन से मुलाकात की तो पता चला कि रमेश चंदेल का बेटा सुरेंद्र दो साल पहले गुम हुआ था, इसकी रिपोर्ट भी थाने में लिखाई थी। प्रशासन ने फोटो मिलान किया तो वह सुरेंद्र ही निकला।
- इसके बाद कलेक्टर निशांत वरवड़े ने एसडीएम शालिनी श्रीवास्तव व सामाजिक न्याय विभाग को निर्देश दिया कि वे बेंगलुरू से उसे लाने या फिर माता-पिता को वहां भेजकर बेटे से मिलवाने की तत्काल व्यवस्था करें।
- लेकिन पिता के पास 1400 किलोमीटर दूर बेंगलुरू जाने के लिए रुपए नहीं थे। बुधवार दोपहर युवक के परिजन कलेक्टर से मिलने पहुंचे और उन्हें अपनी परेशानी बताई। कलेक्टर ने अधिकारी से कहा कि इन्हें रेडक्रॉस से कुछ मदद करवा दो। रास्ते में इन्हें रुपयों की जरूरत पड़ेगी।
- इसके बाद पिता कलेक्टर के पैर छूने आगे बढ़ा, लेकिन उन्होंने राेकते हुए उन्हें कहा कि आप पहले अपने बेटे को लेकर आ जाओ। इसके बाद हम उसके बारे में सोचते हैं। आप बिल्कुल भी टेंशन मत लेना।
गुमने से कुछ माह पहले ही बनवाया था आधार
- सुरेंद्र के पिता रमेश ने कहा कि मैं मजदूर हूं, करीब ढाई साल पहले विजयनगर में आधार कार्ड के लिए कैंप लगा था। मैं परिवार सहित वहां गया और वहां सुरेंद्र का भी कार्ड बनवाया था। पता नहीं था कि यह इतना काम आएगा। इस कार्ड ने तो मुझे मेरा खोया हुआ बेटा दिला दिया। मैंने अधिकारियों से विनती की थी कि मेरे पास इतने रुपए नहीं है कि उसे इंदौर ला सकूं। वे जल्द उसे यहां लाने की व्यवस्था कर दें। इसके बाद कलेक्टर महोदय ने मेरी सुन ली।


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