एक ऐसा स्थान, जहां मनाया जाता है 'मौत का उत्सव'
काशी के मणिकर्णिका घाट का महाश्मशान एक मात्र ऐसा स्थल है, जहां मौत को उत्सव माना जाता है।
अंतिम क्रिया कर्म के दौरान परंपरा के अनुसार 94 लिखकर शिव से प्रार्थना की जाती है कि मुक्ति मार्ग स्वर्ग को जाए, फिर पानी से भरा घड़ा उल्टा करके चिता पर फोड़ते हुए निकल जाते हैं। इस दौरान मुड़कर नहीं देखना चाहिए, ताकि मोह माया से जाने वाले को मुक्ति मिल जाए।
- चिता की आग को ठंडा करने के लिए कुश या फिर बाएं हाथ के अंगूठे से 94 लिख दिया जाता है, जिससे मरने वाला प्रेत न बन जाए। 94 वो मुक्ति का मंत्र है, जिसे शंकर खुद ग्रहण करते हैं।
- पं. रजनीश तिवारी ने बताया, ''इंसान में अगर 100 गुण हो तो वो सर्व गुण संपन्न हो जाता है। काशी में शव ही शिव है, इसका मतलब है, प्रभु आपने जो 94 गुण दिए थे वो आपको समर्पित करते हैं।''
- स्थानीय निवासी और कुछ दिन पहले मां का दाह संस्कार करने वाले विकास खन्ना ने बताया, ''6 बातें (जीवन, मरण, यश, अपयश, लाश, हाानि) किसी इंसान के हाथ में नहीं होती हैं। 94 गुण इंसान के हाथों में होते हैं, जिन्हे 100 गुण मिले वो महापुरुष, सिद्ध पुरुष बनता है।
- मशान नाथ मंदिर के मैनेजर गुलशन कपूर के मुताबिक, मणिकर्णिका घाट पर एवरेज रोज १००, से 140 डेडबॉडी जलती हैं।
- दाह संस्कार यहां 9, 5, 7, 11 मन लकड़ी से किया जाता है। एक मन में 40 किलो होता है।
- पंच पल्लव आम, नीम, पीपल, बरगद और पाकड़ की लकड़ियों से चिता जलती है। ऊपर से छोटा चंदन का लकड़ी भी रखा जाता है। रोज करीब चार हजार किलो लकड़िया तीर्थ पर जलती हैं।

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