एक आइडिया ने बदल दी दुनिया, कबाड़ से बन गया करोड़पति, 40 देशों में करता है बिजनेस
एक युवक कबाड़ से करोड़पति बन गया है। आज दुनिया के करीब 40 देशों उसका कारोबार फैला है। शुरुआती दिनों में ये शख्स कई तरह से बिजनेस में हाथ अजमाया, लेकिन सफलता नहीं मिली। लेकिन एक आइडिया ने इस युवक की जिंदगी बदल दी।
साल 2009 में जब दुनिया में मंदी आई तो उसका असर बिजनेस पर भी पड़ा। ऐसे में इस युवक को काम नहीं मिल रहा था। इसी दौरान उसके दिमाग में कबाड़ से सामान बनाने का आइडिया आया। अब हर साल करोड़ों का बिजनेस दे रहा है।
पश्चिम रास्थान के ह्तेष लोहिया ने कबाड़ में अपनी कलात्मकता जोड़कर कारोबार कर रहे हैं। उन्होंने विदेशों में अपने आइडिया का लोहा मनवा लिया है।
साल 2005 में वो इटंरनेशल फर्निचर और हैंडीक्राफ्ट का व्यवसाय करते थे। लेकिन उनको घाटा होने लगा। इसके बाद उन्होंने केमिकल फैक्ट्री, वॉशिंग पाउडर और स्टोन कटिंग जैसे व्यवसाय में भी हाथ अजमाया। लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी।
इसके साथ ही उनपर आर्थिक दबाव बढ़ता गया। 39 साल के ह्तेष अपनी पत्नी के साथ मिलकर एक छोटी सी प्रोडक्शन यूनिट लगाया। जिसमें कबाड़ से कुर्सी, अलमारी, मेज, सोफा, स्टूल बैग बनाने का काम शुरू किया।
साल 2009 में उनका कारोबार 16 करोड़ रूपए था। जबकि वर्तमान में टर्नओवर 35 करोड़ के पार है। उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा चीन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान, कोरिया जैसे देशों में निर्यात से आता है।
ह्तेष अब स्टूल, मेज के साथ सोफा, कुर्सी, अलमारी, दरी, कारपेट, तकिया जैसे घरेलू इस्तेमाल की चीजें भी बनाने लगे हैं। आज प्रीति इंटरनेशनल की तीन बड़ी प्रोडक्शन यूनिट है। बोरानाडा जूट का सामान बनाती है। जबकि बसानी में टेक्सटाइल का काम होता है।
कंपनी में चार सौ से ज्यादा मजबूर काम करते हैं। हर साल 35 कंटेनर सामान अमेरिका और यूरोपीय देशों में जाता है। 40 देशों में इनकी कंपनी के उपभोक्ता हैं। युवाओं को ये आइडिया खूबर पसंद आ रहा है।
जब मंदी का दौर चल रहा था, उस वक्त डेनमार्क से आए एक ग्राहक की नजर कोने में पड़े डिब्बे पर रखे गद्दे पर गई, जो आकर्षक कुर्सी की तरह था।
उसने ह्तेष को वैसे ही सामान डिजायन करने की सलाह दी। माली हालत खराब थी, इसलिए ह्तेष को ये आइडिया पसंद आया।
ये सारे उत्पाद हाथों से तैयार किये जाते हैं। जिसकी कीमत थोड़ी ज्यादा है। विदेशों में इस कंपनी के उत्पादों की खूब मांग है।
हाल ही में कोरिया में दो हजार दरी के आर्डर पूरा करने के लिए ह्तेष को सेना के टेंट और दूसरे कपड़े नीलामी में खरीदने पड़े। एक दरी का खर्च 500 रूपए है, जबकि इसे दो हजार रुपए में बेचा गया।


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