700 रु. लेकर US गई थी ये लेडी, खड़ा किया 10 मिलियन डॉलर का बिजनेस
यूपी के कानपुर की रहने वाली एक महिला ने अमेरिका में अपना बिजनेस सेटअप कर लिया है। कभी 700 रुपए लेकर US गई ये महिला अब 10 मिलियन डॉलर की मालकिन बन चुकी है। इस महिला से बात करके 700 से 10 मिलियन डॉलर तक के सफर को जानने की कोशिश की।
पूनम गुप्ता कृष्णन कहती हैं, ''मेरी फैमिली कानपुर के शिवालय के पीछे इटावा बाजार गली में 2 कमरों के किराए के मकान में रहती थी। वहीं मेरा जन्म हुआ। पापा रिजर्व बैंक में थे, लेकिन वो ज्यादा ऊंचे पद पर नहीं थे।''
- ''उस समय लड़कियों को ज्यादा पढ़ाया नहीं जाता था। मैं घर में ही पढ़ाई करती थी। पड़ोस में एक अंकल के समझाने पर पापा ने मेरा एडमिशन मनीराम बगिया के सरकारी स्कूल में कराया। 5वीं पास करने के बाद एमजी इंटर कॉलेज से 12th किया। इसके बाद पीपीएन कॉलेज से बीएससी बायोलोजी में किया। एनडी कॉलेज से एमएससी कमेस्ट्री में किया।''
- ''MSC करने के बाद मैंने विदेश जाकर आगे की पढ़ाई करने की बात कही तो घर पर सभी ने मेरा मजाक उड़ाया। पापा नाराज हो गए। उन्होंने कहा- किसी काम की नहीं निकलोगी। हमारे पास इतना पैसा भी नहीं है कि दहेज दे पाएं।''
- ''घर में मेरी शादी की बात शुरू हो गई थी। एक जगह रिश्ता भी तय हो गया था। मैं भगवान से मना रही थी कि किसी तरह मेरा 25 साल निकला दे, ताकि मैं अपनी पढ़ाई पूरी कर सकूं।''
- ''यूएस क्या है, मैं नहीं जानती थी। अब इतना समझती थी कि यूएस में पढ़ाई करने के बाद कुछ अच्छा हो जाता है। एक दोस्त के पिता ने जीआरई और टॉपल के बारे बताया। पापा ने आगे की पढ़ाई के लिए पैसे देने से मना कर दिया था। इसलिए मैंने ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया।''
- ''साथी एन्जॉय करते थे, लेकिन मैं पैसे जोड़ने में जुटी रहती थी। उन दिनों जीआरई के लिए 45 डॉलर का फॉर्म था, जबकि टेस्ट ऑफ इंग्लिश फॉरेन लैंगुएज (टॉफल) का 60 डॉलर था। एक डॉलर की कीमत 32 रुपए के आसपास थी।''
- ''साल 1990 में मैंने पेपर दिया और जीआरई के टेस्ट में टॉप किया और एलोमा यूनिवर्सिटी, शिकागो में एडमिशन लिया। यह कॉलेज कैमिस्ट्री को लेकर यूएस में 8वें नंबर पर था। मुझे स्कॉलरशिप भी तत्काल मिल गई थी।''
जिस दिन वीजा लेकर आई, उस दिन घर में मना मातम
- ''एलोमा युनिवर्सिटी में एडमिशन के बाद जब वीजा के लिए अप्लाई किया, तो पापा बहुत नाराज हुए। उन्हें विश्वास था कि मुझे वीजा नहीं मिलेगा। उनका कहना था- बड़ों बड़ों को वीजा नहीं मिलता, तुम्हे कैसे मिलेगा।''
- ''जिस दिन मैं वीजा लेकर घर गई, उस दिन घर में मातम का माहौल था। पापा पासपोर्ट और वीजा फाड़ने पर उतारू थे। मैं उस दिन बहुत रोई, मुझे खाना भी नहीं मिला था। लेकिन मेरी जिद्द को देखते हुए पापा ने सिर्फ फ्लाइट के टिकट का खर्चा के साथ 20 डॉलर (करीब 700 रुपए) दिया था। साथ ही कहा था- मेरे पास इससे ज्यादा नहीं है।''
- ''1991 में कॉलेज खुलने के 2 दिन पहले मैं शिकागो पहुंच गई थी। एयरपोर्ट पर उतरी तो भूख लगी, 5 डॉलर का एक बिस्किट का पैकेट खरीद लिया, इसके बाद मेरे पास सिर्फ 15 डॉलर बचे थे। शुरुआत में इंग्लिश को लेकर प्रॉब्लम हुई, लेकिन धीरे-धीरे समझ आने लगा।''
- ''साल 1993 में कोर्स पूरा होने से पहले मैंने वीजा वन के तहत वहा जर्मनी की कैबेट कॉर्पोरेशन कंपनी में इंटर्नशिप किया, जोकि 1994 तक चला। वहां मुझे साढ़े 12 डॉलर प्रति घंटे के हिसाब से मिलता था। इसके बाद जापान की कंपनी आईएनएस इंटरनेशनल कंपनी में जॉब किया।''
- ''वहां 2 साल काम करने के बाद 1997 में वापस इंडिआ लौटी और दिल्ली में एक तमिलियन लड़के टी ए कृषणन से शादी की। हमारी लव मैरेज थी। कृषणन शिकागो में मेरे ही कॉलेज से कंप्यूटर इंजीनियरिंग कर रहे थे।''
ऐसे खड़ा किया बिजनेस
- पूनम कहती हैं, ''मेरा बिजनेस का कोई प्लान नहीं था, बस पढ़ाई का जूनून था। हसबैंड के एक दोस्त US में IT कल्सल्टेंट की साईं शॉप के नाम से कंपनी खोल रहे थे। वो चाहते थे कि हस्बैंड उनकी मदद करें, लेकिन कृषणन के पास समय नहीं था, इसलिए उन्होंने मुझे अपने दोस्त के साथ उनकी कंपनी सेटअप में लगा दिया।''
- ''उनके साथ करीब 8 महीने काम करने के बाद मैंने खुद का बिजनेस सेटअप करने का प्लान बनाया और उनकी कंपनी छोड़ दी। नवंबर, 2000 में मैंने सॉफ्टवेयर बनाने वाली आइका इंटरप्राइजेज कंपनी के नाम से रजिस्ट्रेशन कराया और मार्च 2001 में कंपनी लॉन्च कर दी।''
- ''डेटा मैनेजमेंट के सॉफ्वेयर मैन्युफैक्चरिंग करना शुरू किया। धीरे-धीरे बिजनेस चलने लगा। कुछ कंपनियों को डाटा का सॉफ्टवेयर बनाकर दिया। यही नहीं, फ्लोरेडा गवर्मेंट को भी अपना सॉफ्टवेयर बनाकर दिया। वर्त्तमान में मेरी कंपनी का कुल सालाना टर्न ओवर 10 मिलियन डॉलर है।''

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