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भानगढ़ की सच्चाई जानने एक अंग्रेज रुका था पूरी रात, सुबह मिली थी लाश


समय के साथ एक उजड़ा हुआ किला, लेकिन इसकी चारदीवारी में इतिहास, मान्यताओं के साथ अफवाहों के न जाने कितने किस्से बिखरे हुए हैं। हर मौसम में ये किला रंग बदलता है। भीषण गर्मियों में इसका उजाड़पन डराता है, तो बारिश की बूंदों से नहाने के बाद ये हरियाली की चादर ओढ़ लेता है।

राजस्थान के सीनियर जर्नलिस्ट विनोद भारद्वाज ने भानगढ़ को लेकर काफी रिसर्च किया है। eyevid को विनोद भारद्वाज ने भानगढ़ पर कुछ ऐसी बातें बताईं हैं जो कि बहुत कम ही लोगों को पता है। भानगढ़ की इन्हीं बातों को हम अपने रीडर्स के लिए तीन हिस्सों में लेकर आए हैं। आज पेश है 'भानगढ़ और अनसुनी कहानियां' का पहला पार्ट...
अरावली की गोद में बिखरे इन वीरान खंडहरों को देखकर एक विचित्र-सा जो रोमांच होता है, उसका कारण शायद यह है कि प्रचलित मान्यताओं के आधार पर इसे एक भुतहा शहर मान लिया गया है।
एक तरफ पूरी तरह से पहाड़ियों से घिरा और मीलों तक उजड़ा यह पुरातन शहर भले ही कहने को शापग्रस्त मान लिया गया हो, लेकिन इसके खंडहरों की वीरानी में भी सम्मोहित करने वाला सौन्दर्य बसता है। इस सम्मोहन का कारण शायद इस ध्वस्त इमारतों के बीच हजारों की संख्या में उगे केवड़े के पेड़ों का हरापन और उनसे निकलने वाली गंध भी हो सकती है। क्योंकि जब तेज हवा चलती है तो पूरे वातावरण में केवड़े की खूशबू वातावरण को और रहस्यमय बना देती है।
इस भग्न शहर के ठीक बीच में स्थित दो मंजिला जौहरी बाजार से छतों का साया वक्त के साथ विदा हो गया है, लेकिन आसानी से महसूस किया जा सकता है कि जब यह बाजार अपनी पूरी आभा के साथ गुलजार रहा होगा, तो यहां की चहल-पहल का क्या रंग रहा होगा?